रोहिडेश्वर में शिवाजी महाराज की शपथ! स्वराज्य का लक्ष्य कौन सा किला?
रोहिडेश्वर में शिवाजी महाराज की शपथ! स्वराज्य का लक्ष्य कौन सा किला?
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| रोहिडेश्वर में शिवाजी महाराज की शपथ! स्वराज्य का लक्ष्य कौन सा किला? |
रोहिडेश्वर के पवित्र मंदिर में एक ऐसी शपथ ली गई, जिसने इतिहास की दिशा बदलने का संकल्प जगा दिया। शिवाजी राजे और उनके साथियों की आँखों में स्वराज्य का स्वप्न चमक रहा था।
एक वचन, एक विश्वास और भगवान के समक्ष लिया गया दृढ़ निश्चय—लेकिन उस क्षण के पीछे छिपा था एक बड़ा निर्णय, जो आने वाले समय को बदलने वाला था।
सभा में अचानक एक ऐसा प्रस्ताव रखा गया, जिसने सभी का ध्यान किले की ओर मोड़ दिया। क्या यही स्वराज्य की पहली परीक्षा बनने वाला था?
अगली सुबह किस किले पर चढ़ाई होने वाली थी, और क्यों चुना गया वही स्थान? यह रहस्य जानने के लिए पूरी कहानी अवश्य पढ़ें।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की रोहिडेश्वर की ओर शिवाजी राजे का बार-बार जाना दादोजी कोंडदेव के मन में अनेक प्रश्न खड़े कर रहा था। आखिर वहाँ ऐसा क्या घट रहा था जिसे सबसे छिपाया जा रहा था?
राजे के आसपास हर जाति, हर वर्ग और हर आयु के लोगों का बढ़ता समूह किसी बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा था। लेकिन उनकी वास्तविक योजना किसी की समझ में नहीं आ रही थी।
दादोजी के संदेह गहराते गए, जबकि शिवाजी राजे अपने विश्वस्त साथियों और हथियारों के साथ एक गुप्त उद्देश्य की ओर बढ़ते रहे। वातावरण में एक अनकहा रहस्य तैर रहा था।
रोहिडेश्वर मंदिर में शिवलिंग के सामने दंडवत करते हुए राजे के चेहरे पर अद्भुत तेज था। क्या यहीं जन्म लेने वाला था वह संकल्प, जो इतिहास की दिशा बदल देने वाला था?
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१८-२
रोहिडेश्वर में ऐतिहासिक संकल्प
राजे ने कहा, ‘दादाजी, एक बार फिर सोचिए।’
‘सोच लिया।’ दादाजी ने कहा, ‘जीना है, तो शेर की तरह जिएंगे। अब बकरी बनकर जीने का मन नहीं है।’
‘फिर आगे बढ़ें।’
राजाओं ने दादाजी का हाथ पकड़ा। शिवलिंग पर हाथ रखते हुए राजे ने कहा,
‘शंभो, हर हर महादेव! आज, आपकी प्रेरणा से, हम हिंदवी स्वराज की शपथ लेंगे। संकल्प को पूर्ण करने के लिए तुम तैयार हो। जब तक स्वराज्य की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक मित्रता के लिए बढ़ाया गया यह हाथ हम कभी नहीं छोड़ेंगे। दिए गए वचन से हम कभी पीछे नहीं हटेंगे।’
इतना कहकर राजे ने शिवलिंग पर चढ़े हुए बेलपत्र को उठाया और अपने मस्तक से लगाया। दादाजी ने भी राजे का अनुसरण किया। नारियल फोड़े गए। पुजारी प्रसाद की थाली लेकर मंदिर के बाहर आया। मंदिर के सामने एकत्रित हुए सौ या पंद्रह सौ साथी राजा को प्रसन्नता भरी दृष्टि से देख रहे थे।
स्वराज्य के मार्ग की जिम्मेदारी
राजे सीढ़ियों पर बैठ गए। प्रसाद बांटा जा रहा था। येसाजी, बाजी, तानाजी, सभी राजे अब क्या कहते हैं, यहाँ ध्यान दे रहे थे। राजे ने कहा,
‘येसाजी, आज हम शपथ लेकर मुक्त हुए हैं। यह शेंदरी के समीप स्थित स्वयंभू देवता है। इसी की कृपा से हमें आज तक सफलता प्राप्त हुई है और आप जैसे सहचर मिले हैं। आगे के सभी मनोरथ हिंदवी स्वराज्य के हैं। वह उन्हें भी अवश्य पूर्ण करेंगे। किंतु इसके लिए आपकी जिम्मेदारी अत्यंत बड़ी और महत्वपूर्ण है।’
पहले कदम पर विचार-विमर्श
नेताजी राजा के रिश्तेदार हैं। वे आयु में भी बड़े हैं। उन्होंने कहा,
‘कैसा डर है ?’
‘डर नही हैं। पहला कदम कौनसा होना चाहिए, कहा से होना चाहिए, इस बारे में सोच रहे हैं।’
‘इसमें सोचना क्या ?’ तानाजी ने कहा, ‘ईश्वर के समक्ष शपथ ली, वह पहला स्थान।’
‘तात्पर्य ?’
‘तात्पर्य क्या ? रोहिडेश्वर पर कब्जा करके भगवान का स्थान ग्रहण करें। कैसे ?’
रोहिडेश्वर किले की वास्तविक स्थिति
‘बहुत सुंदर ! लेकिन किले की हालत कैसी है ?’
बाजी ने कहा, ‘मैं किले में घूमकर आया हूँ। ज्यादा से ज्यादा दो सौ तक की छावनी हैं। किले को मजबूती नही है। चारों दिशा से टूटा हुआ है।’
‘क्या, दादाजी ?’
‘निश्चय हो गया ! रोहिडेश्वर पर पहली चढ़ाई होगी।’
‘ठीक है।’ राजे ने कहा।
स्वराज्य की पहली चढ़ाई का निर्णय
‘कल रोहिडेश्वर में स्वराज्य की राय लेंगे।’
‘हर-हर महादेव’ की गर्जना उठी। राजाओं ने येसाजी को बुलाया,
‘येसाजी, बाजी, तानाजी, क्या आपके सभी आदमी तैयार हैं ?’
‘हाँ।’
‘रात होने पर सभी लोग रोहिडे की तलहटी में इकट्ठा होना। हम सुबह जल्दी वहाँ पहुँच जाएँगे। कोई शोर या गड़बड़ी मत करना। सब कुछ शांतिपूर्वक होना चाहिए।’
किले की ओर उठती स्वराज्य की नजर
सभी लोग रोहिडेश्वर पर्वत से लौट आए। राजे सामने दिखाई दे रहे किले को देखते हुए नीचे उतर रहे थे।आगे की कहानी?
रोहिडेश्वर की शपथ अब केवल शब्द नहीं रही थी, वह स्वराज्य का संकल्प बन चुकी थी।
राजे की निगाहें सामने खड़े किले पर टिकी थीं, मानो इतिहास उन्हें पुकार रहा हो।
रात के अंधेरे में मावलों की तैयारी शुरू हो चुकी थी, लेकिन किसी को नहीं पता था कि सुबह क्या लेकर आएगी।
क्या रोहिडेश्वर स्वराज्य की पहली विजय बनेगा, या यह संघर्ष किसी नए तूफान की शुरुआत करेगा?
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक और दूरदर्शी नेता। उन्होंने अन्याय के विरुद्ध स्वतंत्र राज्य का स्वप्न देखा। उनकी नेतृत्व क्षमता ने साधारण लोगों को असाधारण योद्धा बना दिया।
- दादाजी नरसप्रभु – शिवाजी महाराज के विश्वसनीय सहयोगी और स्वराज्य के प्रारंभिक समर्थक। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी राजे का साथ दिया। उनकी निष्ठा और साहस प्रेरणादायक थे।
- तानाजी मालुसरे – शिवाजी महाराज के पराक्रमी और निडर मावला। स्वराज्य के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले वीर योद्धा। उनका साहस मराठा इतिहास में अमर है।
- बाजी – स्वराज्य के प्रारंभिक अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विश्वासपात्र साथी। उन्होंने किलों की जानकारी और युद्धनीति में योगदान दिया। उनकी सूझबूझ ने कई निर्णयों को दिशा दी।
- येसाजी कंक – शिवाजी महाराज के विश्वस्त सरदारों में से एक। अनुशासन, निष्ठा और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध। स्वराज्य की नींव मजबूत करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
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लेख का ऐतिहासिक महत्व
रोहिडेश्वर में ली गई यह शपथ मराठा इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है। यहीं से हिंदवी स्वराज्य के विचार को संगठित रूप मिला और शिवाजी महाराज ने अपने विश्वसनीय साथियों के साथ स्वतंत्र राज्य स्थापना का संकल्प लिया। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि विदेशी सत्ता के विरुद्ध आत्मसम्मान और स्वाधीनता की घोषणा थी। रोहिडेश्वर का यह प्रसंग बताता है कि किसी भी महान साम्राज्य की शुरुआत दृढ़ संकल्प, विश्वास और समर्पित साथियों से होती है। आगे चलकर यही संकल्प मराठा साम्राज्य की नींव बना और भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि बड़े लक्ष्य केवल इच्छाओं से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और साहस से पूरे होते हैं।
- शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की स्थापना से पहले अपने साथियों में विश्वास और उद्देश्य की भावना जगाई।
- सही नेतृत्व लोगों को एक सूत्र में बांध सकता है और असंभव दिखने वाले कार्य भी संभव बना सकता है।
- यह कहानी हमें बताती है कि किसी भी परिवर्तन की शुरुआत एक मजबूत निर्णय से होती है।
- जब लक्ष्य राष्ट्र, समाज और धर्म के कल्याण का हो, तब समर्पण और एकता सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं।
निष्कर्ष
रोहिडेश्वर की पवित्र भूमि पर लिया गया यह संकल्प हिंदवी स्वराज्य की आधारशिला साबित हुआ। शिवाजी महाराज और उनके साथियों ने केवल एक किले को जीतने का विचार नहीं किया, बल्कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान के युग का आरंभ किया। यह घटना नेतृत्व, विश्वास और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण है, जो आज भी हर भारतीय को प्रेरणा देती है।
विशेष संवाद
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