शिवाजी महाराज के विवाह में. . . शहाजी महाराज की अनुपस्थिति?
शिवाजी महाराज के विवाह में. . . शहाजी महाराज की अनुपस्थिति?
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| शिवाजी महाराज के विवाह में. . . शहाजी महाराज की अनुपस्थिति? |
विवाह की सारी तैयारियाँ पूरी थीं… महल सजा था, हजारों लोग उत्सुक थे, लेकिन तभी एक ऐसा प्रश्न उठा जिसने पूरे माहौल को बदल दिया। लेन-देन की बात चली—और सबको लगा अब परंपरा निभेगी। मगर तभी रानी जिजाबाई ने जो उत्तर दिया, उसने सभी को स्तब्ध कर दिया।
क्या सच में इस विवाह में कोई दहेज नहीं लिया गया? या फिर कुछ ऐसा माँगा गया जो आज तक किसी ने नहीं सुना?
इधर भव्य तैयारियों के बीच एक और खबर आई—शहाजी महाराज इस विवाह में नहीं आने वाले थे। रानी जिजाबाई का मन बेचैन था, पर उन्होंने खुद को संभाला।
बारात आई, मंडप सजा, मंत्र गूंजे… और फिर हुआ एक ऐसा क्षण, जिसने इस विवाह को इतिहास बना दिया।
लेकिन असली चौंकाने वाली बात तो तब हुई जब साईबाई ने अचानक एक ऐसी जिद कर दी… जिसे सुनकर सब हँस भी पड़े और हैरान भी रह गए।
आखिर क्या था वो रहस्य? पूरा सच जानकर आप भी दंग रह जाएंगे…
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की बैंगलोर से आने वाला एक साधारण सा संदेश… लेकिन उसमें छुपा था एक ऐसा निर्णय, जो इतिहास बदलने वाला था। लाल महल में हर किसी की नजर उसी खबर पर टिकी थी। जैसे ही थैला खुला, दादोजी के चेहरे की चमक ने सब कुछ बता दिया—पर असली बात सुनकर सभी स्तब्ध रह गए।
शहाजी महाराज ने न केवल इस रिश्ते को मंजूरी दी, बल्कि आदेश दिया कि यह विवाह भव्य तरीके से हो… और वे खुद इसमें शामिल होंगे! अब सवाल सिर्फ शादी का नहीं था, बल्कि एक नई शक्ति के जन्म का था।
तैयारियाँ इतनी तेजी से शुरू हुईं कि पूरा पुणे जैसे एक उत्सव में बदल गया। लेकिन तभी एक नई शंका सामने आई—शादी कहाँ होगी? फलटन या पुणे?
मां साहब का जवाब सबको चौंका गया… और उसी पल एक ऐसा निर्णय लिया गया, जिसने इतिहास की दिशा तय कर दी।
आखिर क्या था वह निर्णय? और कैसे इस विवाह ने मराठा साम्राज्य की नींव को और मजबूत किया?
पूरी कहानी पढ़ें… क्योंकि असली रहस्य अभी बाकी है।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१०-५
लेन-देन नहीं, कुछ और चाहिए था
‘जैसा आदेश। किंतु, मां साहब, यदि आपको कोई आपत्ति न हो, तो मैं एक और प्रश्न पूछना चाहूँगा।’
‘क्या ?’
‘सगाई निश्चित हो चुकी। शुभ मुहूर्त निर्धारित कर लिया ; किंतु लेन–देन के विषय में अभी कोई निर्णय नहीं हुआ।’
'लेन-देन तो व्यापार होता है, मामासाहेब ! यह तो रक्त का संबंध है। संतान का दान करने से बड़ा उपहार और क्या हो सकता है ? आपको इसमें कुछ और भी अर्पित करना होगा। यदि वह भी आप दे देंगे, तो हमें फिर कुछ कहने का अधिकार नहीं रहेगा।'
‘आज्ञा दीजिए, मां साहब !’
रानी जिजाबाई की अनोखी मांग
मां साहब मुस्कुराए और बोले, ‘अधिक आशीर्वाद दीजिए। इन्हीं के माध्यम से संसार प्रसन्न हो जाता है। पर्याप्त आशीर्वाद दीजिए, सब कुछ ठीक हो जाएगा।’
'किंतु महाराज क्या कहेंगे ?'
'यहाँ से कोई दोष नहीं दिया जाएगा। यदि पूछा गया, तो निश्चित रूप से हमारा नाम लें।'
मुधोजीराव स्तब्ध रह गए। उन्होंने अंतर्मन से कहा,
'मां साहब, आपने संतान के पालन -पोषण का दायित्व स्वीकार किया है और सात जन्मों तक सद्कर्म किए। कम से कम हमें कोई कार्य तो बताइए, ताकि हमें यह लगे कि हमने विवाह में कुछ योगदान किया है।'
‘बताएँगे ! निश्चित रूप से बताएँगे। मामासाहेब, वर को लाते समय केवल कुछ ही लोगों को न लाएँ। अपने पूरे परिवार को—रैयत समेत—सभी को आमंत्रित कीजिए। हमें भी फलटन यहाँ उतरने की खुशी का अनुभव करने दीजिए।’
भव्य तैयारियां और महल की सजावट
रानी जिजाबाई ने कहा था, इसमें एक भी शब्द असत्य नहीं था। विवाह की तैयारियाँ पूरे धूमधाम के साथ चल रही थीं। महल को सुंदर-सुंदर रंगों से सजाया गया था और रसोई को मंडप में स्थानांतरित कर दिया गया था।
विभिन्न प्रकार के जलपान तैयार किए जा रहे थे और राहुड़ियाँ बनाई जा रही थीं। पाटिल परिवार ने खुशी-खुशी अपना महल निवास के लिए समर्पित कर दिया। मंडप की रचना के लिए मोटे-पतले बाँस के ढेर सावधानीपूर्वक लगाए जा रहे थे। उसके चारों ओर रंग-बिरंगे वस्त्र, हल्के मध्यवर्ती कपड़े और सुन्दर परदे लटकाए जा रहे थे। कनातियों में झिलमिलाते पतेले झूमर चमक रहे थे, और काँच के घरों को भी झिलमिलाते झूमरों से सजाया जा रहा था, जिससे पूरा मंडप मानो उत्सव का आनंद बाँटता हुआ जीवंत प्रतीत हो रहा था।
सुनार की दुकान में, दादोजी की देखरेख में कुशल कारीगर सुंदर आभूषणों का निर्माण कर रहे थे। हीरे, मोती, माणिक और अन्य बहुमूल्य रत्न दान स्वरूप प्रदान किए जा रहे थे। शेष बचा समय अपर्याप्त प्रतीत हो रहा था।
उमाबाई और लक्ष्मीबाई, रानी जिजाबाई की सहायता के लिए आईं। घर का वातावरण अचानक परिवर्तित हो गया। रानी जिजाबाई का समस्त भार पूरी तरह हल्का हो गया।
शहाजी महाराज का न आना
अचानक बीजापुर से यह समाचार प्राप्त हुआ कि शहाजी महाराज विवाह समारोह में उपस्थित नहीं रहेंगे। वे उस समय एक प्रचार अभियान में व्यस्त थे। विवाह संपन्न कराने का दायित्व दादोजी को सौंपा गया था। शहाजी महाराज के न आने से सभी लोग दुःखी हो गए। जिजाऊ अत्यंत चिंतित थीं।
'मुझे ऐसा ही लगा था। वह प्रारंभ से ही ऐसा रहा है। वह युवक था, इसलिए उसने विवाह कर लिया। यदि वह अभी नहीं आया, तो क्या हुआ ? वह बाद में आ जायेगा।'
यदि शहाजी महाराज नहीं आएँगे, तो संभाजी भी नहीं आएँगे।
संभाजी को देखे हुए बहुत लंबा समय बीत चुका था। पूरे ग्यारह वर्ष बीत गए थे। जिजाऊ ने संभाजी के लिए वस्त्र सिलवाए थे, आभूषण बनवाए थे। वह सब कुछ वैसा ही पड़ा रह गया। हृदय के गहन वेदना को संयत करते हुए, रानी जिजाबाई पुनः बारात में सम्मिलित हो गईं।
पांचों देवताओं की पूजा अर्चना कर मुहूर्त निकाला गया। चारों ओर बने मंडपों को सजाया जाने लगा। खंभे खड़े किए गए और स्तंभों को ढक दिया गया। छतें तैयार की गईं, और पर्दे व चादरें हवा में लहराने लगीं।
बारात का भव्य आगमन
मुधोजीराव का रथ गर्जना करते हुए पुणे में प्रवेश किया। नगर से बैलगाड़ियों का एक जुलूस पुणे की ओर चल पड़ा। सभी अपने ही थे। भला कौन पीछे रह जाता? पुणे बैलगाड़ियों और घोड़ों के खुरों की आवाज़ से गूंज रहा था। आश्रय लेने की कोई जगह नहीं थी; लोग गाड़ी में ही शरण लेने लगे। प्रतिदिन हजारों पत्ते उठाए जा रहे थे।
लक्ष्मीबाई बिना किसी विश्राम के काम में व्यस्त थीं। जब भी रानी जिजाबाई उनसे कुछ कहते, वह तुरंत जवाब देतीं।
'आप थोड़ा विश्राम कर ले। यदी हमारी ओर से कुछ भी रह गया हो, तो कृपया हमें सूचित करें।'
विवाह का शुभ मुहूर्त
मुहूर्त का दिन आ गया। लाल महल के प्रांगण लोगों से भर गए। मंगलाष्टकों की आवाजें गूंज उठीं; और शुभ मुहूर्त पर, हजारों हाथों ने वर-वधु पर आशीर्वाद के लिए अक्षत बरसाए। संगीत वाद्ययंत्रों की ध्वनि सुनाई दे रही थी।
शिवाजी राजे मंडप से महल आए। उन्होंने टोपी पहन रखी थी। उनके माथे पर एक तिलक था। उन्होंने जरीबूटी से बना एक कुर्ता पहना हुआ था। उनकी कमर में तलवार लटकी हुई थी। साईबाई उनके पीछे-पीछे चल रही थीं। दोनों ने अनेक आभूषण पहन रखे थे। उनके शॉल की गांठें उनके बीच झुला झुल रही थी। शिवाजी राजे अंदर आए। दोनों ने उमाबाई के चरण स्पर्श किए। उमाबाई ने दोनों को हाथ हिलाकर अभिवादन किया और उनकी कान की बालियों पर उंगलियां छुईं। उन्होंने दोनों को मुहरें भेंट कीं। मां साहब का आशीर्वाद लेकर दोनों सभागृह में आए।
भावुक क्षण
राजे ने दादोजी के चरणों में सिर झुकाया। दादोजी अत्यंत भावुक हो गए। पूरा बदन काँप रहा था। बिना कुछ कहे उन्होंने राजे को गले लगा लिया।
साईबाई की मासूम जिद
बारात की तैयारियां की गईं। गहनों से सजा एक सुंदर घोड़ा प्रकट हुआ। साईबाई ने कहा,
'मैं घोड़े की सवारी करूंगी !'
'यह घोड़ा सिर्फ तुम्हारे लिए लाया हैं।'
'अरे ! मुझे एक और घोड़े की जरूरत है। मैं घोड़े की सवारी कर सकती हूँ !'
सभी लोग चौंक गए। सब हँसे बिना नहीं रह सके। रानी जिजाबाई ने कहा,
'यह क्या सैर है ? बारात है यह ! अगर आप चाहें तो मैं आपको बाद में दूसरा घोड़ा दे दूंगी।'
बारात और गृह प्रवेश
बारात चलने लगी। सैकड़ों चिराग की रोशनी में बारात आगे बढ़ रही थी। दादोजी, मुधोजी, हनुमंते, शास्त्री और कोर्डे आगे चल रहे थे। उनके आगे दंडपट्टा, लेज़िम और तलवारें खेले जा रहे थे। आगे वाद्ययंत्रों का समूह था। बारात चींटी के कदमों से चल रही थीं।
आतिशबाज़ी की आवाज़ से सई चौंककर जाग रही थीं। राजे की आँखों पर पानी लगाया जा रहा था ताकि वह सो न जाएँ। जोगेश्वरी से बारात महल लौटने में सुबह हुई। साईबाई को जगा दिया गया। महल के द्वार के दहलीज पर रखी माप को उड़ेल कर गृहलक्ष्मी भोंसले के घर में दाखिल हुईं। अनाज महल के अंदर बिखर गया।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- शिवाजी राजे – मराठा साम्राज्य के संस्थापक और वीर योद्धा।
- रानी जिजाबाई – शिवाजी राजे के संस्कारों की प्रेरणा और मार्गदर्शक।
- सईबाई – शिवाजी महाराज की धर्मपत्नी और सरल स्वभाव की रानी।
- शहाजी महाराज – शिवाजी राजे के पिता और महान योद्धा।
- दादोजी कोंडदेव – शिवाजी राजे के गुरु और मार्गदर्शक।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह विवाह केवल एक पारिवारिक आयोजन नहीं था, बल्कि मराठा समाज की एकता और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक था। रानी जिजाबाई ने इसे सामाजिक समरसता का रूप दिया, जिसमें रैयत को भी शामिल किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिवाजी महाराज का जीवन शुरू से ही जनसामान्य से जुड़ा हुआ था और यही आगे चलकर स्वराज्य की नींव बना।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह घटना सिखाती है कि रिश्ते व्यापार नहीं होते, बल्कि विश्वास और संस्कारों पर आधारित होते हैं।
- रानी जिजाबाई ने यह दिखाया कि सच्चा धन आशीर्वाद और एकता है।
- समाज को साथ लेकर चलना ही सच्ची नेतृत्व क्षमता है।
निष्कर्ष
शिवाजी महाराज का विवाह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक संदेश था—समानता, संस्कार और समाज की एकता का। यही मूल्य आगे चलकर उनके महान व्यक्तित्व की नींव बने।
विशेष संवाद
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External References
अचानक बीजापुर से आया ऐसा संदेश

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