छत्रपति शिवाजी महाराज का बचपन और शहाजी महाराज का अचानक आगमन!
छत्रपति शिवाजी महाराज का बचपन और शहाजी महाराज का अचानक आगमन!
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| छत्रपति शिवाजी महाराज का बचपन और शहाजी महाराज का अचानक आगमन! |
बाल शिवाजी का बचपन केवल खेल और मासूम मुस्कानों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें भविष्य के स्वराज्य की अनसुनी आहट छिपी थी।
दादी की गोद, रानी जिजाबाई का स्नेह और दासियों के कंधों पर पल रहा यह बालक हर दिन कुछ अलग संकेत दे रहा था।
जब एक साधारण पंचरसी कड़ा बाल शिवाजी के पैरों में पहनाया गया, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यही बालक आगे चलकर इतिहास बदल देगा।
धीरे-धीरे बाल शिवाजी की चंचल हरकतें, उनकी तेज नजरें और हर वस्तु को पकड़ने की उत्सुकता सबको हैरान करने लगी।
दूसरी ओर आसमान में मंडराते बादल, सूखी धरती और दुर्ग में जमा होता अनाज आने वाले समय के किसी बड़े तूफान की चेतावनी दे रहे थे।
फिर अचानक खबर आई—शहाजी महाराज दुर्ग पर लौट रहे हैं! रानी जिजाबाई की धड़कनें तेज हो उठीं।
तट से उड़ती धूल, घोड़ों की टापें और बढ़ती बेचैनी के बीच एक ऐसा मिलन होने वाला था, जो केवल परिवार का नहीं, बल्कि भविष्य के स्वराज्य का संकेत बन गया।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की शिवनेरी दुर्ग की ठंडी सुबह में हर ओर उत्सव था, लेकिन रानी जिजाबाई की आंखों में एक अनकहा दर्द छिपा था।
महल शहनाइयों से गूंज रहा था, दासियां रंगोलियां सजा रही थीं और पूरा किला उस नवजात बालक के नामकरण का साक्षी बनने उमड़ पड़ा था, जिसे आगे चलकर इतिहास “शिवाजी” के नाम से जानने वाला था।
जब जिजाऊ ने धीरे से बच्चे के कान में “शिवाजी” कहा, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि इस नाम के पीछे देवी शिवाई से जुड़ी एक गहरी मन्नत और टूटे हुए दिल की कहानी छिपी है।
देवी के दर्शन के समय रानी जिजाबाई ने विश्वासराव को मखमली थैली सौंपी। उसमें थीं सौ सोने की मोहरें — एक अधूरी प्रतिज्ञा की अंतिम निशानी।
जिस व्यक्ति ने यह मन्नत मांगी थी, वह अब इस दुनिया में नहीं था… लेकिन जिजाऊ ने उसकी आखिरी इच्छा को मरने नहीं दिया।
जैसे ही सोने की मोहरें बाल शिवाजी के तकिए पर बरसीं, वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। उसी क्षण इतिहास ने चुपचाप करवट ली।
पिछे पढ़ें. . .इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
७-१
दादी और माता के स्नेह में बाल शिवाजी का बचपन
बाल शिवाजी अपनी दादी की गोद में, अपनी मां की गोद में, दासी के कंधों पर बढ़ता है।
कोई खिलौने बेचने वाली दरवाजे पर आए और खिलौने दिखाए और उसे विश्वासराव खरीद ले। जुन्नार गए हुए शास्त्री आते समय पीतल का कड़ा लेते हुए आए। सब हंसे, तब वे कहे,
‘सरकार ! चांदी के कड़े से बच्चे पर बचपना चढ़ता नहीं। चढ़ता है, वो इन पंचरसी कड़े से !’
उमाबाई ने सिर हिलाया। कहा, ‘वास्तव में, किसी के मन में नहीं आया। लाओ वो कड़ा।’ और सुनहरी कड़ा उतार दिया और पांव पर पंचरसी कड़ा चढ़ाया गया।
बाल शिवाजी की बढ़ती चंचलता
बच्चे की प्रशंसा से यह समझ में नहीं आ रहा था कि दिन कब ढल गया और कब अस्त हो गया। बाल शिवाजी प्रतिपदा के चंद्रमा की तरह हर दिन एक नया रूप धारण कर रहे थे। अपने लोगों को जानकर वह हंसने लगा। यह कठिनाई से कुस बदलने लगा। वह मुड़ा और अपने चारों हाथों पर खिलौना लेने के लिए आगे बढ़ने लगा; और इससे उन्होंने चार औजारों का उपयोग करके रेंगने की कीमिया का एहसास किया। हाथ में एक हथकड़ी आई और बाल शिवाजी के आस-पास की सभी वस्तुओं को रखने की सतर्कता बढ़ने लगी।
दुष्काल की आशंका और दुर्ग की तैयारी
मृग आया। पश्चिम की हवाएं शुरू हुईं। धीरे-धीरे बादल सिर के ऊपर से फिसलने लगे; लेकिन वे पृथ्वी पर ध्यान भी नहीं दे रहे थे। वैशाख में गरमा गरम धारीत्री भी सांस छोड़ रहे थे। इन संकेतों को देखकर विश्वासराव ने दुर्ग में एक गंजखाना बनवाया। दुर्ग के नीचे से अनाज लाया गया और अंबरखाना में भर दिया गया।
शहाजी महाराज के आगमन का समाचार
एक दिन शाम को विश्वासराव अचानक रानी जिजाबाई के कक्ष में आ गए। रानी जिजाबाई को संदेश चला गया। विश्वासराव ने देखा कि रानी जिजाबाई काशीदा को भर रही है। बाल शिवाजी खिलौने से खेल रहे थे। उनका ध्यान विश्वासराव पर गया; और वह कूद गया। विश्वासराव ने बाल शिवाजी को उठाकर कहा,
‘रानी साहब, खबर आई है कि महाराज की सवारी दुर्ग पर आ रही है।’
‘कब ?’ रानी जिजाबाई ने खुशी से पूछा।
‘किसी भी क्षण वे आएंगे और दुर्ग में प्रवेश करेंगे। मैं यही सूचित करने आया था।’
रानी जिजाबाई की प्रतीक्षा
विश्वासराव बाल शिवाजी के साथ मुड़े। रानी जिजाबाई ने कहा,
‘उसे यहां दे दो। कपड़े बदलना है।’
विश्वासराव बाल शिवाजी को छोड़कर बाहर चले गए। भवन के अंदर के चौक में कक्ष के नीचे एक चांदी का गंगाल पानी से भर दिया। कक्ष पर एक स्वच्छ बैठक बिछाई गई। चौक के दूसरी ओर विशेष बैठक बिछाई गई। कक्ष को कालीन, भार, थाली, पंडाने से सजाया गया था।
रानी जिजाबाई ने अपने कपड़े बदल लिए। गहने पहनें। लक्ष्मीबाई बाल शिवाजी को सजाने में व्यस्त थीं। बाल शिवाजी की तैयारी कर लक्ष्मीबाई रानी जिजाबाई को ढूंढने लगी; लेकिन उनका पता नहीं मिला। वे जीभ के दरवाजे से निकले; और उनके कदम रुक गए।
रानी जिजाबाई तट के किनारे के पास खड़े होकर देख रहे थे। उनकी पीठ पर धूप की किरणों में भी कपड़े चमक रहे थे। हवा चल रही थी। जिजाऊ की नजर तट के किनारे पर थी। धीमी कदमों से लक्ष्मीबाई तट के पास चली गईं। लक्ष्मीबाई तब तक सफल नहीं हुईं जब तक कि रानी जिजाबाई करीब न जाएं। वह सदमे में मुड़ गई।
‘तुम हा ? मैं क्या डर गई !’
‘बहुत ढूंढा ; कहीं दिखाई नहीं दिए।’
‘ऐसे ही आए थे। खडे हुए। चलो, निकलते है।’
‘नहीं। यहा ऐसे ही रहो।’ लक्ष्मीबाई ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘इतने जल्दी भवन में जाने का क्या कारण है ?’
‘बहुत छलते हो, लक्ष्मीबाई, तुम !’ रानी जिजाबाई ने तट के किनारे बैठे हुए कहा।
दोनों तट के नीचे के इलाके को देख रहे थे। सूखा पड़ने के कारण पूरा इलाका सूखा लग रहा था। कुछ समय हो गया है; और रानी जिजाबाई उठ खड़ी हुई। ‘तुम क्यों उठते हो ?’ लक्ष्मीबाई ने पूछा तो उन्होंने इशारा किया। दूर-दूर तक धूल उड़ रही थी। वह लोट पल-पल नजदीक आता जा रहा था। घोड़ी दिखाई दी। घोड़े नजर आए। दुर्ग की ओर एक चक्कर तेज गति से जुन्नार की ओर जा रहा था। कानों में टापों की आवाज आ रही थी।
शहाजी महाराज का दुर्ग में प्रवेश
‘लक्ष्मीबाई !’
‘क्या ?’
‘कुछ नहीं। ऐसे ही चिढ़ाओगी !’
‘कहो ना ! नही चिढ़ाऊंगी। वादा !’
‘चलो अस्त की ओर चलते हैं !’
‘समझ गयी ! चलो ! झील के पार जाते है।’
दोनों भवन के सामने झील के किनारे चले गए। रानी जिजाबाई ने देखा... घोड़ी जुन्नार में प्रवेश कर रही थी। धीरे-धीरे घोड़ी जुन्नार से निकलकर दुर्ग की ओर आने लगी। लक्ष्मीबाई ने पूछा,
‘रानी साहब ! दुर्ग के नीचे जाना चाहिए, या भवन जाना चाहिए ?’
‘बस, लक्ष्मीबाई...! आओ।’
दोनों भवन में लौट आए।
दुर्ग के प्रवेश द्वार पर गड़गड़ाहट सुनाई दी। विश्वासराव कक्ष में खडे थे। नारो त्रिमल, पंत आदि ने विनम्रता से कपड़े पहने खड़े थे। दूसरे दरवाजे की नौबत सुनाई दि; और विश्वासराव ने सबके साथ शहाजी महाराज का सामना किया। शहाजी महाराज की मुलाकात गंगा जमुना टंकियों के पास हुई। सबकी कमर झुक गई। मुजरे गिर गए। शहाजी महाराज ने एक मुस्कान के साथ विश्वासराव को गले लगाया।
आगे की कहानी?
शहाजी महाराज के दुर्ग में प्रवेश करते ही पूरा वातावरण सम्मान और गर्व से भर उठा, लेकिन रानी जिजाबाई की आँखों में केवल एक पत्नी की खुशी नहीं थी। उनकी नजरें बार-बार बाल शिवाजी पर टिक रही थीं, मानो वे भविष्य की कोई अनकही छवि देख रही हों। उधर बाल शिवाजी अपनी मासूम आँखों से सब कुछ देख रहे थे, जैसे हर दृश्य उनके मन में अंकित हो रहा हो।
किसे पता था कि यही बालक, जिसके पैरों में आज पंचरसी कड़ा पहनाया गया है, एक दिन मुगलों और सल्तनतों की नींव हिला देगा। लेकिन उस रात दुर्ग की हवाओं में एक अजीब बेचैनी थी... मानो आने वाला समय स्वराज्य की सबसे बड़ी कहानी लिखने वाला था।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- रानी जिजाबाई – छत्रपति शिवाजी महाराज की माता रानी जिजाबाई साहस, धर्म और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने बचपन से ही शिवाजी के मन में स्वराज्य और न्याय के संस्कार डाले। उनकी दूरदृष्टि ने ही भविष्य के महान योद्धा को आकार दिया।
- बाल शिवाजी – बाल शिवाजी बचपन से ही तेजस्वी, जिज्ञासु और चंचल स्वभाव के थे। उनकी हर छोटी हरकत में भविष्य के महान नेतृत्व की झलक दिखाई देती थी। यही बालक आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य का संस्थापक बना।
- शहाजी महाराज – शहाजी महाराज एक पराक्रमी योद्धा और कुशल रणनीतिकार थे। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिवार और मराठा सम्मान की रक्षा की। उनका व्यक्तित्व शिवाजी महाराज के जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ गया।
- विश्वासराव – विश्वासराव दुर्ग के विश्वसनीय और दूरदर्शी सेवक थे। वे हर परिस्थिति में सतर्क रहकर दुर्ग की सुरक्षा और व्यवस्था संभालते थे। उनकी निष्ठा ने राजपरिवार का विश्वास मजबूत किया।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
बाल शिवाजी के बचपन से जुड़ी यह घटना केवल पारिवारिक प्रसंग नहीं, बल्कि भविष्य के स्वराज्य की नींव का संकेत है। पंचरसी कड़ा पहनाने की परंपरा उस समय की मान्यताओं और संस्कारों को दर्शाती है। रानी जिजाबाई का मातृत्व, शहाजी महाराज की प्रतिष्ठा और दुर्ग की तैयारियाँ उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब हैं। यही वातावरण बाल शिवाजी के मन में साहस, सतर्कता और नेतृत्व के गुण विकसित कर रहा था। इतिहास गवाह है कि इन्हीं संस्कारों ने आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की प्रेरणा दी।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि महान व्यक्तित्व अचानक तैयार नहीं होते, बल्कि उनके संस्कार बचपन से ही गढ़े जाते हैं।
- रानी जिजाबाई जैसी माता का मार्गदर्शन, परिवार का स्नेह और कठिन परिस्थितियों का अनुभव ही बाल शिवाजी को महान बना सका।
- छोटी-छोटी परंपराएँ और संस्कार भविष्य की दिशा तय करते हैं।
- साथ ही यह भी सीख मिलती है कि हर संकट के पहले सतर्कता और तैयारी आवश्यक होती है।
- जीवन में धैर्य, दूरदृष्टि और आत्मविश्वास ही सफलता की असली कुंजी हैं।
निष्कर्ष
बाल शिवाजी का यह प्रसंग केवल एक बच्चे के बचपन की कहानी नहीं, बल्कि स्वराज्य के उदय की पहली आहट है। रानी जिजाबाई का स्नेह, शहाजी महाराज का आगमन और दुर्ग का वातावरण मिलकर एक ऐसे इतिहास की नींव रखते हैं, जिसने आगे चलकर भारत का भविष्य बदल दिया। यह कथा भावनाओं, संस्कारों और प्रेरणा का अद्भुत संगम है।
विशेष संवाद
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