राजमाता जिजाबाई | पुत्र जन्म, चौंकाने वाली भविष्यवाणी! मराठा इतिहास
राजमाता जिजाबाई | पुत्र जन्म, चौंकाने वाली भविष्यवाणी! मराठा इतिहास
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| राजमाता जिजाबाई | पुत्र जन्म, चौंकाने वाली भविष्यवाणी! मराठा इतिहास |
अंधेरी रात, महल में पसरा सन्नाटा और हर गुजरते पल के साथ बढ़ती बेचैनी… सबकी निगाहें एक ही खबर पर टिकी थीं।
रानी जिजाबाई प्रसूति कक्ष में थीं, जबकि बाहर विश्वासराव, नारोपंत और पूरा परिवार भय और उम्मीद के बीच झूल रहा था।
तभी अचानक दासी की आवाज गूंजी— “सरकार, लड़का हुआ है!” लेकिन यह केवल एक बच्चे का जन्म नहीं था… मानो टूटी हुई किस्मत के बीच आशा का नया सूर्य उग आया हो।
चारों ओर युद्ध, विश्वासघात और विनाश का समय था। अपना घर उजड़ चुका था, रिश्ते दुश्मनी में बदल चुके थे और भविष्य अंधकारमय दिखाई देता था।
ऐसे कठिन समय में जन्मे उस बालक की कुंडली देखकर शास्त्रीजी ने जो भविष्यवाणी की, उसने सबको स्तब्ध कर दिया। उन्होंने कहा— “यह बालक समय का ऋण चुकाएगा।”
क्या यह साधारण बालक आगे चलकर इतिहास बदलने वाला था?
क्या सचमुच उसके जन्म के साथ भाग्य ने करवट ली थी?
यही रहस्य इस कथा को बेहद भावनात्मक, प्रेरणादायक और रोमांचकारी बना देता है।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की लखुजीराव की निर्मम हत्या ने रानी जिजाबाई के जीवन को भीतर तक तोड़ दिया था। रातों की नींद गायब हो चुकी थी।
हल्की सी आहट भी उन्हें भय से कंपा देती।
लेन्याद्री की ओर टकटकी लगाए बैठी रानी जिजाबाई की आँखों में केवल दर्द और अनकहा डर दिखाई देता था।
महल का हर व्यक्ति उन्हें संभालने का प्रयास कर रहा था, परंतु उनका दुःख किसी के शब्दों से कम नहीं हो रहा था।
लेकिन तभी लक्ष्मीबाई ने उन्हें उस सत्य का एहसास कराया, जिसे शोक में डूबी रानी जिजाबाई भूल चुकी थीं—उनकी कोख में पल रहा वह बालक, जो आने वाले समय का भाग्य बदल सकता था।
यह सुनते ही रानी जिजाबाई का हृदय कांप उठा। उन्होंने स्वयं को संभालने की प्रतिज्ञा ली।
समय बीतता गया… शिवनेरी दुर्ग में हर ओर प्रतीक्षा बढ़ने लगी। वैद्य, ब्राह्मण, दासियाँ और पूरा किला एक रहस्यमयी क्षण की राह देख रहा था।
आखिर वह कौन सा बालक था, जिसके जन्म से पहले ही वातावरण में अद्भुत संकेत दिखाई देने लगे थे?
पूरी कहानी पढ़े।इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
५-२
महल में बढ़ती बेचैनी और इंतजार की लंबी रात
समय चींटी की चाल से आगे बढ़ रहा था। प्रहर बीत गए। शाम हो गई। बत्ती का समय हो गया था, लेकिन कोई खबर नहीं थी। हर गुजरते पल के साथ चिंता बढ़ती जा रही थी। दिख रही थी, वह उपचारीका की और दासी की भागदौड़। नरोपंत तो देवी के मंदिर में कब के जा चुके थे।
बत्ती का समय हो गया। रात बढ़ती जा रही थी। चिंतित विश्वासराव दफ्तर में इधर-उधर भाग रहे थे। मशाल हवा में लहरा रही थी। दीवार पर छायाएं खेल रही थीं। क्या बात करें, किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था।
पुत्र जन्म का शुभ समाचार
और दासी दौड़ती हुई आई। उनके चेहरे पर ख़ुशी छलक रही थी। उसने कहा,
‘सरकार, लड़का हुआ है !’
विश्वासराव को अपनी ख़ुशी छुपाना मुश्किल हो गया। उन्होंने कमर की कस उतारकर दासी के शरीर पर उडा दी। शास्त्रीजी गुणनखंड, वृत्तों की गिनती करते हुए पुत्र जन्म के समय कि टिप्पणी करने में लगे। विश्वासराव ने कहा,
‘मां की कृपा !’
विश्वासराव को अचानक नारोपंत याद आए। विश्वासराव ने उन्हें सूचित करने के लिए एक नौकर भेजा।
नवजात शिशु का स्वागत
सुवासिनी द्वारा गरम पानी से बच्चे को नहलाया गया। वेदमूर्ति ने बच्चे को आशीर्वाद दिया। स्वस्तिवाचन किया गया। उपचारिका-दासींयों के चेहरे पर संतुष्टि थी। वह रानी जिजाबाई को बहुत प्यार और विश्वास से रखती थी।
कुंडली निर्माण और भविष्यवाणी
विश्वासराव शास्त्रीजी को लेकर रानी जिजाबाई के पास गये। बच्चे पर सुनहरी मुहरें लगाई गईं। विश्वासराव ने रानी जिजाबाई से कहा,
‘रानी साहब, शास्त्री आये हैं।’
रानी जिजाबाई ने अपनी नींद की स्थिति से बड़ी मुश्किल से नमस्ते किया।
शास्त्रीजी के लिए मृगचर्म बिछाए गए थे। आशीर्वाद देकर शास्त्रीजी आसन पर बैठ गये। सामने चांदी का पाट रखा था। दोनों तरफ चिराग जलाए गए। शास्त्रीजी ने पंचांग खोला। सभी बच्चे की भविष्यवाणी सुनने के लिए उत्सुकता से प्रसूति कक्ष के द्वार पर इकट्ठा थे। ये शब्द सुनाई देने लगे:
‘श्रीगणेशाय नम :। शुभं भवतु...’
रानी जिजाबाई की चिंता और शास्त्रीजी की भविष्यवाणी
शास्त्रीजी ने उंगलियां गिन लीं। गुणनखंड, वृत्तों की गिनती का गणित प्रस्तुत किया गया। ग्रह कुंडली के घर भरने लगे। कुंडली प्रस्तुत करके होते ही शास्त्रीजी ने रानी जिजाबाई की ओर देखा।
रानी जिजाबाई ने कहा,
‘शास्त्रीजी, बिना किसी हिचकिचाहट के सब कुछ स्पष्ट रूप से बताओ। इस लड़के के समय, दिन बीतते गये और घर का ठिकाना नहीं रहा। किसी का कोई मुकाबला नहीं था। खून के रिश्ते में दुश्मनी थी। जहागीरी पर गधे का हल चला। दादाजी को खो दिया। आज के दिन लड़के का पिता दुश्मन के पीछे दौड़ता है। उसका बड़ा भाई छोटा है। वह भी इस दावानल से मुक्त नहीं है। पूरे देश के खाने का बुरा हाल है... और अन्य क्षेत्र में, अन्य जगह पर, न मायके में, न ससुराल में, मैं आज उसे जन्म दे रही हूं। यह पेट में था तब ऐसा था ! अब आप ही बताएं कि इस कदम से और क्या-क्या परेशानियां होने वाली हैं।’
यह सुनकर सबके मन व्याकुल हो गये; लेकिन शास्त्रीजी के चेहरे से शिकन नहीं हटी। मुस्कुराता चेहरा गंभीर नहीं हुआ। उन्होंने उसी मुस्कान के साथ कहा,
‘रानी साहब, ऐसी अभद्रता मन में न लाओ ! अशुभता को मन में न छूने दें। दुर्भाग्य ख़त्म हो गया। भाग्य जाग उठा। वास्तविक सूर्य अस्त हो गया है।’
महान भविष्य की घोषणा
रानी जिजाबाई उदास होकर मुस्कुरायीं। उसने कहा,
‘बच्चे की कुंडली निकालते समय हर शास्त्री यही कहता है।’
शास्त्री गंभीर हो गये। वह शांत, गहरी आवाज में बोले,
‘रानी साहब, अविश्वास मत करो। अभी तक इस शास्त्री की भविष्यवाणी झूठी साबित नहीं हुई। मैंने यह भविष्यवाणी लालच से नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव और आत्मविश्वास से की है। यह समय से नहीं चूकेगा। यह बच्चा जनम-जनम का एहसान चुकायेगा। रानी साहब, कृपया यह न भूलें कि जब पाप का बोझ बढ़ गया था, जब धारित्रि पीड़ित थी, जब देवकी-वसुदेव कंस की जेल में थे, तब श्री कृष्ण का जन्म हुआ था।’
‘आपके मुंह में चीनी !’ रानी जिजाबाई ने संतोष से कहा। उनकी नज़र गोद में मौजूद बच्चे पर गयी। वे मुट्ठियां भींचकर शांति से सो गये थे।
आगे की कहानी?
महल की दीपशिखाएँ धीरे-धीरे मंद पड़ रही थीं। बाहर अंधेरी रात थी, लेकिन उस छोटे से बालक के चेहरे पर अद्भुत तेज चमक रहा था। रानी जिजाबाई की थकी आँखों में पहली बार उम्मीद दिखाई दी। शास्त्रीजी की भविष्यवाणी अभी भी सबके कानों में गूंज रही थी— “यह बालक समय का ऋण चुकाएगा...”
किसी को नहीं पता था कि गोद में शांत सो रहा वही बालक आगे चलकर अन्याय के विरुद्ध तूफ़ान बनकर उठेगा। आने वाले वर्षों में तलवारें टकराएँगी, साम्राज्य काँपेंगे और इतिहास नई दिशा लेगा। लेकिन उस रात… किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह जन्म केवल एक पुत्र का नहीं, बल्कि स्वराज्य के भविष्य का जन्म था।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- रानी जिजाबाई – धैर्य, त्याग और स्वाभिमान की प्रतीक रानी जिजाबाई कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहीं। उन्होंने अपने पुत्र में धर्म, न्याय और स्वराज्य के संस्कार डाले। उनकी दूरदृष्टि ने इतिहास की दिशा बदल दी।
- विश्वासराव – विश्वासराव परिवार के प्रति निष्ठावान और जिम्मेदार व्यक्ति थे। पुत्र जन्म के समाचार से उनकी खुशी और चिंता दोनों स्पष्ट दिखाई देती हैं। वे हर परिस्थिति में परिवार का सहारा बने रहे।
- नारोपंत – नारोपंत धार्मिक आस्था और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक थे। संकट की घड़ी में वे देवी मंदिर में प्रार्थना करने चले गये थे। उनकी उपस्थिति परिवार की आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती है।
- शास्त्रीजी – शास्त्रीजी विद्वान और अनुभवी ज्योतिषी थे। उन्होंने नवजात बालक की कुंडली देखकर महान भविष्यवाणी की। उनके शब्दों ने निराश वातावरण में आशा का प्रकाश भर दिया।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग मराठा इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है। उस समय दक्कन में राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और विश्वासघात का वातावरण था। ऐसे कठिन दौर में जन्मे इस बालक ने आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य की नींव रखी। रानी जिजाबाई के संघर्ष, त्याग और संस्कारों ने एक ऐसे महान योद्धा को जन्म दिया जिसने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई। शास्त्रीजी की भविष्यवाणी केवल ज्योतिषीय कथन नहीं थी, बल्कि आने वाले इतिहास की झलक थी। यह घटना मराठा साम्राज्य के उदय का भावनात्मक और प्रेरणादायक प्रारंभ मानी जाती है।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह कथा सिखाती है कि सबसे अंधकारमय समय में भी आशा का दीप बुझना नहीं चाहिए।
- कठिन परिस्थितियाँ महान व्यक्तित्वों को जन्म देती हैं। रानी जिजाबाई ने दुख, संघर्ष और अकेलेपन के बीच भी साहस नहीं छोड़ा।
- उनके धैर्य और विश्वास ने आने वाले इतिहास को बदल दिया। यह कहानी बताती है कि माता के संस्कार किसी भी व्यक्ति के भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं।
- जब मनुष्य अपने उद्देश्य पर अडिग रहता है, तब विपरीत परिस्थितियाँ भी उसकी सफलता का मार्ग बन जाती हैं।
निष्कर्ष
यह प्रसंग केवल एक बालक के जन्म का वर्णन नहीं, बल्कि स्वराज्य के भविष्य की शुरुआत है। रानी जिजाबाई का संघर्ष, शास्त्रीजी की भविष्यवाणी और महल का तनावपूर्ण वातावरण इस घटना को अत्यंत भावनात्मक बना देता है। इतिहास गवाह है कि उसी बालक ने आगे चलकर अन्याय के विरुद्ध नई क्रांति खड़ी की। यही कारण है कि यह कथा आज भी प्रेरणा, साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
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