छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास | लखुजीराव जाधव से विश्वासघात, हत्या?
छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास | लखुजीराव जाधव से विश्वासघात, हत्या?
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| छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास | लखुजीराव जाधव से विश्वासघात, हत्या? |
लखुजीराव की निर्मम हत्या ने रानी जिजाबाई के जीवन को भीतर तक तोड़ दिया था। रातों की नींद गायब हो चुकी थी।
हल्की सी आहट भी उन्हें भय से कंपा देती।
लेन्याद्री की ओर टकटकी लगाए बैठी रानी जिजाबाई की आँखों में केवल दर्द और अनकहा डर दिखाई देता था।
महल का हर व्यक्ति उन्हें संभालने का प्रयास कर रहा था, परंतु उनका दुःख किसी के शब्दों से कम नहीं हो रहा था।
लेकिन तभी लक्ष्मीबाई ने उन्हें उस सत्य का एहसास कराया, जिसे शोक में डूबी रानी जिजाबाई भूल चुकी थीं—उनकी कोख में पल रहा वह बालक, जो आने वाले समय का भाग्य बदल सकता था।
यह सुनते ही रानी जिजाबाई का हृदय कांप उठा। उन्होंने स्वयं को संभालने की प्रतिज्ञा ली।
समय बीतता गया… शिवनेरी दुर्ग में हर ओर प्रतीक्षा बढ़ने लगी। वैद्य, ब्राह्मण, दासियाँ और पूरा किला एक रहस्यमयी क्षण की राह देख रहा था।
आखिर वह कौन सा बालक था, जिसके जन्म से पहले ही वातावरण में अद्भुत संकेत दिखाई देने लगे थे?
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की महल में अजीब सा सन्नाटा था। रानी जिजाबाई को महसूस हो रहा था कि कुछ भयानक छुपाया जा रहा है।
जब उन्होंने विश्वासराव को बुलाकर सच जानने की ठानी, तो जो सामने आया उसने उनकी दुनिया ही उजाड़ दी।
उनके पिता, लखुजीराव जाधव, जिन्हें वे अपना सबसे बड़ा सहारा मानती थीं, एक भयानक साजिश का शिकार हो चुके थे।
दौलताबाद के दरबार में सम्मान के नाम पर बुलाकर उन्हें और उनके बेटों को बेरहमी से मार डाला गया। यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी, बल्कि एक परिवार, एक शक्ति और एक विश्वास का अंत था।
रानी जिजाबाई का मन आक्रोश, पीड़ा और अविश्वास से भर गया। उनके शब्दों में दर्द साफ झलक रहा था—क्या इस दुनिया में न्याय बचा है? क्या भगवान सच में हैं?
इस घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
अब उनके सामने सिर्फ एक सवाल था—इस अन्याय का बदला कैसे लिया जाएगा? लेकिन क्या यह अंत था… या किसी बड़े तूफान की शुरुआत?
यह जानने के लिए पूरी कहानी पढ़े।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
५-१
लखुजीराव की हत्या के बाद टूट चुकी थीं रानी जिजाबाई
लखुजीराव की हत्या की खबर से सदमे में आई रानी जिजाबाई सदमे से जल्दी उबरे नहीं। वे रात को घबराहट से जाग जाती। पूरा शरीर पसीने से भीग जाता था। घर में गलती से बर्तनों की खड़खड़ाहट सुनाई दे, तो भी वह डर जाती। वातायन से नजर आ रही लेन्याद्री की ओर देखती रहती थी। कोई बोलने जाता तो आंखें डबडबा जातीं। वक्ता को शब्द सुझतें नहीं।
रानी जिजाबाई को प्रसन्न करने के लक्ष्मीबाई के प्रयास विफल रहे।
लक्ष्मीबाई ने रानी जिजाबाई को दिलाया आने वाले भविष्य का एहसास
एक दिन लक्ष्मीबाई ने कहा,
‘रानी साहब, यह क्या चलाया है आपने ? जो हुआ उसके लिए मुझे खेद क्यों नहीं है ? हर कोई इस बात से दुखी है। आपकी परवाह नहीं है ; लेकिन उस बच्चे की है। कम से कम गर्भ में पल रहे बच्चे पर तो ध्यान दो। क्या इस परेशानी का असर बच्चे पर होने से रहेगा ?’
मातृत्व की जागृति
रानी जिजाबाई का पूरा शरीर भय से कांप उठा। वियोग के सदमे में वह अपने बच्चे को भूल गई थी। रानी जिजाबाई ने कहा,
‘नहीं, लक्ष्मीबाई, ऐसा मत कहो। पोंछी हुई आंखें को देखो। मैं दोबारा शोक नहीं करूंगी। मेरा दुःख मेरे साथ। इसका बोझ किसी और पर क्यों ?’
वास्तव में ?
बिल्कुल शिवाई कसम ! आप कहें, मैं वैसे करूंगी। चिंता मत करो।
‘छूटी !’
उस दिन से रानी जिजाबाई फिर से भवन में टहलने लगीं।
शिवनेरी दुर्ग में नए जीवन के आगमन की तैयारी
नौ महीने हो गए।
लक्ष्मीबाई को दिन में एक बात सुझती थीं। विश्वासराव ने भगवान को अभिषेक चालू रखें थे। ब्राह्मण अनुष्ठान के लिए बैठे थे। जानकार नौकरानियां जिजाऊ की सेवा में थीं। दुर्ग पर अनुभवी, कुशल उपचारिका और विशेषज्ञ वैद्य मौजूद थे।
प्रसूति कक्ष में दीवारों पर स्वस्तिक बनाए, जिन्हें चूने से चमकदार बनाया गया। छत पर मोतियों की झालर सजी हुई थी। कमरे में अंधेरा न दिखे, इसके लिए चांदी के चिराग चमक रहे थे। मंच पर ताजे पानी का सुनहरा कलश चमक रहा था। वास्तु न बिगड़े इसलिए हर जगह सफेद सरसों डाल दी। ऊंचाई की गंध हवा में तैर रही थी। पूरे दुर्ग का जनजीवन नये जीवन की प्रतीक्षा में डूबा हुआ था।
दफ्तर पर चिंता और चर्चा
दो बजे का सूरज डूब चुका था। ठंडी हवा शुरू हो गई थी। विश्वासराव, गोमाजी नाइक, वैद्यराज सभी दफ्तर पर पान इकट्ठा करते बैठे थे। पत्ते पर चूना लगाते हुए नाइक ने विश्वासराव से कहा,
‘सरकार, आज बात नहीं कर रहे ?’
‘क्या कहें, गोमाजीपंत ? क्या आपको याद है कि मां साहब ने एक इस्मा की ढलान से गिराने की सज़ा रद्द कर दी थी ?’
‘हां ! मां साहेब का हृदय कोमल है।’
‘यह सच है ; लेकिन दिन-ब-दिन ये मात्रा बढ़ती जा रही है। शिकायतें आ रही हैं। अगर इस साल बारिश समय पर न हुई तो अगला साल मुश्किल दिख रहा है।’
‘मैं बोलूं ?’ शास्त्रीजी ने पूछा।
‘बोलो ना।’
‘मुझे अगले कुछ साल अच्छे नहीं दिख रहे हैं। ग्रहों से स्पष्ट सूखा दिख रहा है।’
‘ख़ूब कहा है ! इन भाग्य-कथन से बेहतर रानी साहब के बारे में कुछ अच्छा कहिए !’
प्रसूति का समय
‘इसके बारे में चिंता मत करो। मैं निश्चिंत हूं।’ शास्त्रीजी ने कहा।
‘मैंने आज नब्ज़ देखी। अब ज्यादा देर नहीं लगेगी। किसी भी क्षण...’ वैद्य जी ने अपनी बात कही।
उसी समय दासी दफ्तर की सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आई। विनम्र से कहा,
‘सरकार, रानी साहब के पेट में दर्द हो रहा है। इसलिए मां साहेब ने तुम्हें संदेश भेजा है।’
‘कोई अनुमान न चुकें।’ वैद्यराज ने धीमी आवाज में कहा।
‘मैं तो यही कह रहा था।’ शास्त्रीजी ने राहत की सांस ली।
सभी लोग व्याकुलता से उठे। उठने से कोई लाभ नहीं, यह याद आया तो फिर से बैठे।
आगे की कहानी?
शिवनेरी दुर्ग की हवाओं में उस रात एक अजीब बेचैनी तैर रही थी। प्रसूति कक्ष के बाहर हर चेहरा चिंता से भरा था, तो भीतर रानी जिजाबाई असहनीय पीड़ा सहते हुए भविष्य को जन्म देने की तैयारी कर रही थीं। वैद्यराज की गंभीर आंखें, शास्त्रीजी की रहस्यमयी भविष्यवाणी और पूरे दुर्ग में फैला सन्नाटा… मानो प्रकृति स्वयं किसी महान घटना की प्रतीक्षा कर रही थी।
लेकिन किसी को यह आभास नहीं था कि उसी रात जन्म लेने वाला वह बालक आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य की नींव रखेगा और इतिहास की दिशा बदल देगा। आखिर कौन था वह बालक, जिसकी पहली सांस के साथ मुगलों की सत्ता को चुनौती मिलने वाली थी?
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- रानी जिजाबाई – वीरता, धैर्य और मातृत्व की प्रतिमूर्ति रानी जिजाबाई ने कठिन परिस्थितियों में भी साहस नहीं छोड़ा। उनकी सोच और संस्कारों ने आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान योद्धा को जन्म दिया। मराठा इतिहास में उनका स्थान प्रेरणा और शक्ति के स्रोत के रूप में माना जाता है।
- लक्ष्मीबाई – लक्ष्मीबाई केवल सेविका नहीं, बल्कि रानी जिजाबाई की सच्ची शुभचिंतक थीं। उन्होंने दुःख में डूबी रानी जिजाबाई को आने वाले भविष्य की जिम्मेदारी का एहसास कराया। उनकी संवेदनशीलता ने रानी जिजाबाई को मानसिक रूप से संभालने में बड़ी भूमिका निभाई।
- विश्वासराव – विश्वासराव दुर्ग के जिम्मेदार और दूरदर्शी व्यक्ति थे। वे राज्य, जनता और भविष्य की परिस्थितियों को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। उनकी बातचीत उस समय की राजनीतिक और सामाजिक कठिनाइयों को दर्शाती है।
- वैद्यराज – अनुभवी वैद्यराज अपनी विद्या और समझ के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने रानी जिजाबाई की स्थिति को देखकर आने वाले महत्वपूर्ण क्षण का संकेत पहले ही दे दिया था। उनकी उपस्थिति दुर्ग में विश्वास और आशा का प्रतीक थी।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग केवल एक माँ के दुःख और मातृत्व की कहानी नहीं, बल्कि मराठा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत है। लखुजीराव की हत्या के बाद रानी जिजाबाई मानसिक रूप से टूट चुकी थीं, लेकिन उसी संघर्ष के बीच भविष्य बदलने वाला बालक जन्म लेने वाला था। शिवनेरी दुर्ग का यह वातावरण उस समय की राजनीतिक अस्थिरता, भय और आशा को दर्शाता है। यही बालक आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज बने, जिन्होंने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर भारतीय इतिहास को नई दिशा दी।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह कथा सिखाती है कि कठिन से कठिन दुःख के बीच भी आशा का दीप जलाए रखना चाहिए।
- रानी जिजाबाई ने व्यक्तिगत पीड़ा को अपने भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।
- एक माँ का साहस, धैर्य और संस्कार पूरे इतिहास को बदल सकते हैं।
- यह कहानी बताती है कि विपरीत परिस्थितियाँ महान व्यक्तित्वों को जन्म देती हैं और संघर्ष ही भविष्य की सबसे बड़ी ताकत बनता है।
निष्कर्ष
रानी जिजाबाई का यह संघर्ष केवल मातृत्व की पीड़ा नहीं था, बल्कि आने वाले स्वराज्य की नींव थी। शिवनेरी दुर्ग में व्याप्त भय, रहस्य और उम्मीद ने उस ऐतिहासिक क्षण को जन्म दिया, जिसने भारत के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। यह प्रसंग साहस, धैर्य और भविष्य पर विश्वास की अमर प्रेरणा देता है।
विशेष संवाद
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