रोहिडेश्वर में शिवाजी महाराज का संकल्प! क्या यहीं जन्मा स्वराज्य का सपना?
रोहिडेश्वर में शिवाजी महाराज का संकल्प! क्या यहीं जन्मा स्वराज्य का सपना?
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| रोहिडेश्वर में शिवाजी महाराज का संकल्प! क्या यहीं जन्मा स्वराज्य का सपना? |
राजगढ़ में एक साधारण यात्रा की तैयारी हो रही थी... पर किसी को नहीं पता था कि यह यात्रा इतिहास बदल देगी।
रोहिडेश्वर की शांत वादियों में एक तूफ़ान जन्म लेने वाला था। शिवबा के मन में वर्षों से सुलग रही पीड़ा आज शब्द बन रही थी।
लुटती प्रजा, अपमानित धर्म और बिखरे हुए मावलों का दर्द उमड़ पड़ा। साथियों ने प्रश्न पूछे, और राजे के हृदय की ज्वाला भड़क उठी।
पहाड़ों के बीच पहली बार स्वराज्य का स्वप्न स्पष्ट दिखाई देने लगा। फिर शिवाजी महाराज ने ऐसा विचार रखा, जिसने उपस्थित हर व्यक्ति की सांसें थाम दीं...!
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की मावल की धरती पर एक ऐसी घटना घटी जिसने न्याय, सत्ता और मानवता की परिभाषा ही बदल दी।
एक निर्दोष बालिका पर हुए अत्याचार की खबर जब युवा शिवाजी राजे तक पहुँची, तो पूरे क्षेत्र में भय और आक्रोश की लहर दौड़ गई।
अपराधी कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, बल्कि वही पाटिल था जिसे प्रजा की रक्षा का दायित्व सौंपा गया था।
दरबार में जब अपराधी को लाया गया, तो सभी को लगा कि धन, पद और प्रभाव उसे बचा लेंगे। लेकिन उस दिन राजे की आँखों में केवल एक पीड़ित बेटी का दर्द दिखाई दे रहा था।
न्याय की गुहार, दया की याचना और परंपराओं के बहाने भी राजे के निर्णय को डिगा नहीं सके। फिर ऐसा फैसला सुनाया गया जिसने पूरे मावल को स्तब्ध कर दिया।
राजे के शब्दों में केवल क्रोध नहीं था, बल्कि उस स्वराज्य की झलक थी जहाँ स्त्री का सम्मान सर्वोच्च था।
इस निर्णय के बाद प्रजा के मन में शिवाजी राजे के प्रति श्रद्धा कई गुना बढ़ गई, जबकि अत्याचारियों के हृदय में भय घर कर गया।
आखिर ऐसा कौन-सा न्याय था जिसने युवा शिवाजी राजे को सच्चा राजा सिद्ध कर दिया? पूरी कहानी आपको उसी ऐतिहासिक क्षण तक ले जाएगी।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१५-१
राजगढ़ में रोहिडेश्वर यात्रा की तयारी
‘मां साहब !’ शिवाजी राजे ने महल में प्रवेश करते हुए कहा, ‘हम प्रातःकाल रोहिडेश्वर के दर्शन के लिए प्रस्थान करने वाले हैं।’
संध्या होने को आई थी। रानी जिजाबाई ने कहा, ‘राजे, संध्या होने को आई। कम से कम सुबह तो बता देते ! अब नाश्ता कब करेंगे ?’
‘यह तो दोपहर में ही तय हो गया था।’
‘क्या दादोजी भी आ रहे हैं ?’
‘नही।’
‘फिर ?’
‘बाजी, येसाजी, चिमनाजी, बालाजी यह सब है।’
‘पंत जी को इसकी सूचना दे दी ?’
‘हाँ। उन्होंने कहा, जाओ।’
‘ठीक है। कब लौटेंगे ?’
‘परसों लौट आएँगे।’
‘पड़ाव ?’
‘नाचनी में ही पड़ाव रहेगा। बाजी का घर है वहाँ।’
‘उनके घर रुकेंगे ?’
‘तो इसमें क्या आपत्ति है ?’
‘कारण से नहीं कह रही हूँ। लेकिन राजे, वह एक गरीब का घर। राजा के घर आने पर उस पर बहुत अधिक बोझ पड़ जाता है। आपके लोग, अश्वारोही दल !’
‘तो फिर नाचनी मे एक सवार भेज देंगे। सूचना पहुँचा देंगे।’
‘वह भी तो गाँव पर एक बोझ ही होगा, है न ?’
‘तब ?’
‘चिंता मत कीजिए, राजे ! आप निःसंकोच बाजी के यहाँ ठहरिए ; किंतु सवारों का राशन अभी भेज दीजिए। मैं निकलवा देती हूँ। सवारों से कह देना कि वे अपना खाना स्वयं बना लें।’
शिवबा प्रसन्नतापूर्वक बाहर चले गए।
रोहिडेश्वर के प्रति शिवाजी महाराज का आकर्षण
राजे को आलंदी और जेजुरी जैसे तीर्थस्थलों पर जाना बहुत अच्छा लगता था। इन्हीं स्थानों में अब रोहिडेश्वर का भी समावेश हो गया था। ऊँचे पर्वत-शिखर पर, घने जंगलों के बीच भगवान शिव का यह मंदिर स्थित था।
प्रकृति की मनोहारी छटा से सुसज्जित उस प्रदेश ने शिवाजी राजे के मन में उसके प्रति एक विशेष आकर्षण और गहरी आत्मीयता उत्पन्न कर दी। रोहिडेश्वर के बार-बार होने वाले दर्शनों के दौरान दादाजी नरसप्रभू गुप्ते जैसे अनेक व्यक्ति शिवाजी राजे के अत्यंत निकट और आत्मीय बन गए थे।
रोहिडेश्वर मंदिर में विचार-मंथन
दोपहर का समय होने पर भी रोहिडेश्वर कितना शांत था। ठंडी हवा शरीर में नवचेतना का संचार कर रही थी। सामने फैला मावल मनमोहक प्रतीत हो रहा था। शंभू के दर्शन करने के पश्चात् सभी लोग देवता के समक्ष बैठ गए थे। राजे कुछ भी नहीं बोल रहे थे। चिमानाजी नरहेकर ने कहा,
‘राजे, आज आप कुछ बोल नहीं रहे हैं।’
‘मैं क्या कहूँ, चिमानाजी ? जो केवल नाम के राजा होते हैं, उनके लिए न कुछ खुलकर कहना संभव होता है और न ही अपनी इच्छा से कोई कदम उठाना।’
‘कौन नाममात्र के राजा ?’
‘हम ! और कौन ? देखो, गुप्ते, ऐसा लग रहा है जैसे पूरा क्षेत्र बेहोश हो गया हो। पहले निज़ामशाही, अब आदिलशाही। किंतु क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं। शाही सेनाएँ आती, तो वे क्षेत्र को लूटती ; और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति उसी से करती। किलेदार भी इस कार्य में उनका साथ देते...और लोग कितने बेशर्म ! यह सब सहन करते हैं। उजड़ चुके गाँवों को फिर वहीं बसाते। स्त्रियों और कन्याओं को उठा ले जाया जाता, फिर भी किसी पर कोई प्रभाव नहीं।’
मावलों की शक्ति और प्रजा की पीड़ा
‘राजे, यह सब किसी को शौक से तो नहीं करना पड़ता,’ येसाजी ने कहा। ‘प्रजा तो मानो भेड़ों के झुंड, उसका कोई रखवाला नहीं। यूँ ही जंगलों और वीरानों में भटकती रहती है।’
‘येसाजी, मुझे मावलों की ताकत का पूरा परिचय है। साधारण डंडे से भी भेड़िये को परास्त कर देने वाले मावले, यदि एक हो जाएँ, तो...’
‘तो क्या, राजे... ?’
‘तो... तो क्या कहूँ ?’ राजाओं का सीना चौड़ा हो गया। ‘तो हमारे देवताओं को यूँ पहाड़ो में छिपकर नहीं रहना पड़ेगा। हमारी माताओं-बहनों को खुले में निकलने से इस तरह डरना नहीं पड़ता। लोग किसके हैं, और राज्य किसका है ?’
‘पर यह कैसे हो पाएगा ?’
‘क्यों नहीं हो सकता ? अगर ये जागीरदार, देशमुख, पाटील और कुलकर्णी एक हो जाएँ, तो उनकी ताकत का अंदाज़ा लगाना भी कठिन होगा !’
स्वराज्य की पहली स्पष्ट झलक
‘विजापुर की ताकद कम है क्या ?’ बालाजी ने शंका निकली।
‘हाँ, है। हम उनकी वास्तविक शक्ति का स्वयं अनुभव कर चुके हैं। बादशाह के लोग ऐसे हैं, जो ऊँट पर सवार होकर बकरियाँ हाँकने वाले लोगों की भाँति हैं। बालाजी, श्रीराम के पास कौन-सी सेना थी ? रावण महान तपस्वी था, योगशक्ति से संपन्न तथा अनेक सिद्धियों का स्वामी ;’
आगे की कहानी?
रोहिडेश्वर की शांत वादियों में शिवाजी राजे के शब्द गूंज रहे थे। उनके मन में स्वराज्य की ज्वाला धधक रही थी, जिसे सुनकर सभी मावले स्तब्ध रह गए।
जब राजे ने श्रीराम और रावण का उदाहरण दिया, तो साथियों को लगा कि वे केवल इतिहास नहीं, भविष्य की दिशा बता रहे हैं।
हर चेहरे पर एक ही प्रश्न था—क्या सचमुच अत्याचारी सल्तनतों को चुनौती दी जा सकती है?
तभी शिवाजी राजे ने अगला वाक्य बोलने के लिए कदम आगे बढ़ाया... और
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – दूरदर्शी, साहसी और स्वराज्य के महान स्वप्नद्रष्टा। वे अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और हिंदवी स्वराज्य की स्थापना के लिए संकल्पित थे।
- राजमाता जिजाबाई – शिवाजी महाराज की माता और प्रेरणास्रोत। उन्होंने शिवाजी महाराज के भीतर धर्म, न्याय और राष्ट्रभक्ति के संस्कार स्थापित किए।
- येसाजी कंक – शिवाजी महाराज के विश्वसनीय साथी और निष्ठावान मावले। हर कठिन परिस्थिति में वे राजे के साथ खड़े रहे।
- बाजी पासलकर – मावल क्षेत्र के प्रभावशाली सरदार और शिवाजी महाराज के समर्थक। स्वराज्य की प्रारंभिक योजनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- चिमनाजी नरहेकर – शिवाजी महाराज के निकट सहयोगी। वे राजे के विचारों को समझने और उन्हें आगे बढ़ाने वालों में प्रमुख थे।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
रोहिडेश्वर का प्रसंग छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। यहीं पर उन्होंने मावल क्षेत्र की स्थिति, प्रजा पर हो रहे अत्याचार और विदेशी सत्ता की अन्यायपूर्ण नीतियों पर गंभीर चिंतन किया। यह घटना केवल धार्मिक यात्रा नहीं थी, बल्कि स्वराज्य के विचार को आकार देने वाली ऐतिहासिक बैठक थी। शिवाजी महाराज ने अपने साथियों के सामने पहली बार संगठित शक्ति, स्वाभिमान और स्वतंत्र शासन की आवश्यकता पर जोर दिया। रोहिडेश्वर का यह चिंतन आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का आधार बना। इस घटना ने मावलों में आत्मविश्वास जगाया और उन्हें एक महान उद्देश्य के लिए एकत्रित किया। भारतीय इतिहास में यह प्रसंग स्वतंत्रता, नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि किसी भी बड़े परिवर्तन की शुरुआत एक महान विचार से होती है।
- शिवाजी महाराज ने परिस्थितियों को दोष देने के बजाय समाधान खोजने का मार्ग चुना।
- उन्होंने लोगों को उनकी शक्ति का एहसास कराया और एकता के महत्व को समझाया।
- यह घटना बताती है कि नेतृत्व केवल शासन करने का नाम नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देने का दायित्व भी है।
- कठिन परिस्थितियों में भी यदि दृढ़ संकल्प, साहस और स्पष्ट उद्देश्य हो, तो असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं।
- शिवाजी महाराज का यह चिंतन आज भी युवाओं को आत्मविश्वास, राष्ट्रप्रेम और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करता है।
निष्कर्ष
रोहिडेश्वर का यह प्रसंग केवल एक तीर्थयात्रा का वर्णन नहीं, बल्कि स्वराज्य के उदय की प्रारंभिक आहट है। शिवाजी महाराज के विचारों ने मावल की धरती पर एक ऐसी चेतना जगाई जिसने आगे चलकर इतिहास की दिशा बदल दी। अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, प्रजा के प्रति संवेदनशीलता और स्वतंत्र शासन का स्वप्न—यही इस घटना का सार है। रोहिडेश्वर में बोया गया यह बीज आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य के विशाल वटवृक्ष में परिवर्तित हुआ।
विशेष संवाद
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