शिवाजी महाराज का रोहिडेश्वर आना जाना, दादोजी का संदेह! क्या है रहस्य?
शिवाजी महाराज का रोहिडेश्वर आना जाना, दादोजी का संदेह! क्या है रहस्य?
![]() |
| शिवाजी महाराज का रोहिडेश्वर आना जाना, दादोजी का संदेह! क्या है रहस्य? |
रोहिडेश्वर की ओर शिवाजी राजे का बार-बार जाना दादोजी कोंडदेव के मन में अनेक प्रश्न खड़े कर रहा था। आखिर वहाँ ऐसा क्या घट रहा था जिसे सबसे छिपाया जा रहा था?
राजे के आसपास हर जाति, हर वर्ग और हर आयु के लोगों का बढ़ता समूह किसी बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा था। लेकिन उनकी वास्तविक योजना किसी की समझ में नहीं आ रही थी।
दादोजी के संदेह गहराते गए, जबकि शिवाजी राजे अपने विश्वस्त साथियों और हथियारों के साथ एक गुप्त उद्देश्य की ओर बढ़ते रहे। वातावरण में एक अनकहा रहस्य तैर रहा था।
रोहिडेश्वर मंदिर में शिवलिंग के सामने दंडवत करते हुए राजे के चेहरे पर अद्भुत तेज था। क्या यहीं जन्म लेने वाला था वह संकल्प, जो इतिहास की दिशा बदल देने वाला था?
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की दादोजी कोंडदेव ने राजा के बगीचे से केवल एक आम तोड़ा था, लेकिन उसी क्षण उन्हें लगा कि उन्होंने अपनी निष्ठा और धर्म का उल्लंघन कर दिया है।
अपराधबोध इतना गहरा था कि वे स्वयं को दंड देने के लिए तलवार उठा बैठे। पूरा घर भय और चिंता से भर गया।
जब राजमाता जिजाबाई उनके सामने पहुँचीं, तो एक वृद्ध तपस्वी की आँखों से बहते आँसू देखकर सभी स्तब्ध रह गए।
क्या एक साधारण आम सचमुच इतना मूल्यवान था, या उसके पीछे छिपा था ईमानदारी और कर्तव्य का ऐसा रहस्य, जो आज भी लोगों को प्रेरित करता है?
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१८-१
खेडबारे से पुणे की ओर प्रस्थान
खेडबारे का निवास स्थान जल्द ही पुणे में स्थानांतरित हो गया। शिवाजी राजे पुणे जाने के लिए जल्दी से रवाना हुए। माँ साहब को इन दिनों शिवाजी राजे का व्यवहार समझ नहीं आ रहा था। रांझे के पाटिल की घटना के बाद से राजे अत्यंत गंभीर हो गए थे। वे या तो घर में अकेले बैठे रहते, अथवा अधिकांश समय भ्रमण करने में व्यतीत करते थे।
रोहिडेश्वर की ओर रहस्यमयी यात्रा
पुणे आते ही राजे फिर से रोहिडेश्वर गए। उस समय पंत काम के लिए जुन्नार गए थे। दादोजी जुन्नार से लौटे। उन्होंने पूछताछ की। उन्हें पता चला कि राजे रोहिडेश्वर गए है। पंत चिंतित हो गए। माँ साहब से कहा,
‘माँ साहब, राजे अचानक रोहिडेश्वर क्यों चले गए ? अभी तो आठ दिन पहले ही वे खेडबारे से भी होकर आए थे, है न ?’
‘हाँ ! उन्हें वह जगह बहुत पसंद है। उनमें धर्म के प्रति बहुत गहरी आस्था है।’
‘यह बुरा नहीं है ! लेकिन मुझे कुछ और ही गंध आ रही है।’
‘किस प्रकार ?’
‘हाल ही में राजे के आसपास एकत्र होने वाले लोगों पर ध्यान दिया ? नेताजी, येसाजी, तानाजी, बाजी, बालाजी, चिमनाजी... आखिर कितने नाम गिनाऊँ ? हर बार कोई न कोई नया व्यक्ति दिखाई देता है। और वह दादाजी नरसप्रभु तो इन दिनों मानो उनकी परछाईं बनकर हर समय साथ ही रहता है।’
‘क्या कहना है आपका ?’
‘मुझे कुछ समझ नही आ रहा ? माँ साहब ! यदि राजाओं के समान आयु के लोग होते, तो मैं समझ जाता ; लेकिन राजाओं के साथ, चाहे वे बड़े हों या छोटे, हर कोई दिखाई देता है। ब्राह्मण, मराठा, महार, रामोशी, प्रभु... अठारहों जातियों के लोग भी हैं। उनमें देशमुख हैं, देशपांडे हैं। मावलें हैं। राजे के मन में क्या योजना है, यह समझ पाना कठिन हो गया है।’
‘दादोजी, आप बेवजह ही कल्पनाओं का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं ! इसका अर्थ तो बस यही है कि हर कोई राजाओं पर मोहित है। और इसमें बुराई क्या है ?’
दादोजी कोई उत्तर नहीं दे सके। वे बस फिर लौट गए।
दादोजी के संदेह और बढ़ती गतिविधियाँ
दादोजी के संदेह में कुछ भी झूठ नहीं था। शिवापुर का पूरा वाड़ा भोर होते ही मावलों से भर गया था। वाड़े की अश्वशाला घोड़ों से सुसज्जित हो चुकी थी। जब राजे बाहर आए, तो उनके साथ दादाजी नरसप्रभु गुप्ते, येसाजी, तानाजी, बालाजी और चिमनाजी जैसे विश्वस्त साथी भी उपस्थित थे। लोहार भीमा झुककर अभिवादन करके खड़ा हो गया।
‘भीमा, कहातक पहुँचे ?’
‘पचास तलवारें और एक सौ एक भाले तैयार है।’
‘शाबाश ! और बाकी सबके ?’
‘वह भी उतने ही होंगे।’
‘चलो चलते हैं।’
संकल्प की ओर कदम
सभी लोग रोहिडेश्वर की ओर चल पड़े। दोपहर के समय तक सभी रोहिडेश्वर पहुँच गए। शिवाजी राजे के मुख पर एक विलक्षण तेज झलक रहा था। झरने के जल से हाथ-पैर धोकर वे रोहिडेश्वर मंदिर में प्रवेश किए। दादाजी नरसप्रभु और पुजारी ने पूजा की। बेलपत्रों से आच्छादित शिवलिंग के समक्ष राजे ने साष्टांग दंडवत प्रणाम किया।
आगे की कहानी?
रोहिडेश्वर के शांत मंदिर में शिवाजी राजे ने शिवलिंग के समक्ष मस्तक झुका दिया। उनके चेहरे का तेज बता रहा था कि उनके हृदय में कोई असाधारण संकल्प जन्म ले चुका है।
दादोजी कोंडदेव के मन में उठ रहे संदेह अब और भी गहरे हो गए थे। आखिर इतनी गुप्त तैयारियाँ किस उद्देश्य के लिए की जा रही थीं?
मावलों, तलवारों और विश्वस्त साथियों की यह सभा किसी साधारण यात्रा का हिस्सा नहीं थी। इतिहास मानो एक नए मोड़ पर खड़ा था।
लेकिन उस दिन रोहिडेश्वर में ऐसा क्या हुआ, यह रहस्य अभी खुलना बाकी था...
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी राजे – स्वराज्य के स्वप्नद्रष्टा और दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता। कम आयु में ही उन्होंने स्वतंत्र हिंदवी स्वराज्य का संकल्प लिया। उनकी प्रतिभा और साहस ने इतिहास की दिशा बदल दी।
- राजमाता जिजाबाई – शिवाजी महाराज की माता और उनकी प्रेरणा शक्ति। धर्म, न्याय और स्वाभिमान के संस्कार उन्होंने ही शिवाजी राजे को दिए। उनका मार्गदर्शन स्वराज्य की नींव बना।
- दादोजी कोंडदेव – शिवाजी राजे के संरक्षक और कुशल प्रशासक। वे राजे की गतिविधियों पर सदैव ध्यान रखते थे। स्वराज्य की प्रारंभिक तैयारियों को लेकर उनके मन में अनेक प्रश्न थे।
- दादाजी नरसप्रभु गुप्ते – शिवाजी राजे के विश्वस्त सहयोगी। वे हर महत्वपूर्ण कार्य में राजे के साथ रहते थे और प्रारंभिक स्वराज्य आंदोलन के प्रमुख समर्थकों में थे।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
रोहिडेश्वर की यह घटना मराठा इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी कालखंड में शिवाजी राजे ने विभिन्न जातियों, वर्गों और क्षेत्रों के लोगों को एक सूत्र में जोड़ना प्रारंभ किया। यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं थी, बल्कि स्वराज्य की प्रारंभिक नींव रखने की प्रक्रिया थी। मावलों का संगठन, हथियारों की तैयारी और विश्वस्त सहयोगियों का बढ़ता समूह इस बात का संकेत था कि शिवाजी राजे भविष्य के लिए एक बड़ी योजना पर कार्य कर रहे थे। रोहिडेश्वर मंदिर बाद में उस स्थान के रूप में प्रसिद्ध हुआ जहाँ स्वराज्य का विचार जन-जन तक पहुँचने लगा। यह घटना नेतृत्व, संगठन और राष्ट्रनिर्माण की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व रखती है।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि महान परिवर्तन अचानक नहीं होते, बल्कि उनकी तैयारी लंबे समय तक गुप्त रूप से चलती है।
- शिवाजी राजे ने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई, जिससे एक मजबूत संगठन खड़ा हुआ।
- नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास जीतना भी है।
- यह घटना हमें धैर्य, दूरदर्शिता, संगठन शक्ति और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण का महत्व समझाती है।
- बड़े सपनों को साकार करने के लिए स्पष्ट उद्देश्य और योग्य सहयोगियों का साथ आवश्यक होता है।
निष्कर्ष
रोहिडेश्वर की यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी, बल्कि स्वराज्य के उदय का प्रारंभिक संकेत थी। शिवाजी राजे की गंभीरता, गुप्त तैयारियाँ और बढ़ता जनसमर्थन आने वाले ऐतिहासिक परिवर्तनों की भूमिका तैयार कर रहे थे। यही वह समय था जब स्वराज्य का स्वप्न आकार लेने लगा और इतिहास ने एक नए युग की आहट सुनी।
विशेष संवाद
संबंधित लेख
छत्रपति शिवाजी महाराज की एक बंदूक की गोली... और काँप उठा पूरा जंगल!
छत्रपति शिवाजी महाराज ने मारी बाघिन! फिर रखा ऐसा नाम, जो इतिहास बन गया
क्यों क्रोधित हुईं राजमाता जिजाबाई? शिवाजी महाराज से मंगवाई क्षमा!

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें