ससुर जी ही बने छत्रपति शिवाजी महाराज के शत्रु! फलटन में क्या हुआ आगे?
ससुर जी ही बने छत्रपति शिवाजी महाराज के शत्रु! फलटन में क्या हुआ आगे?
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| ससुर जी ही बने छत्रपति शिवाजी महाराज के शत्रु! फलटन में क्या हुआ आगे? |
स्वराज्य की राह में अब विदेशी नहीं, अपने ही रिश्तेदार सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ गए। शिवाजी महाराज के सामने ऐसा निर्णय था, जो दिल और कर्तव्य दोनों की परीक्षा लेने वाला था।
मां साहब ने रक्त संबंधों को बचाने की विनती की, लेकिन समय तलवार की धार पर खड़ा था। क्या रिश्ते टूटेंगे या इतिहास नई दिशा लेगा?
फलटन पहुँचकर जो दृश्य शिवाजी महाराज ने देखा, उसने हर किसी को चौंका दिया। तभी गाँव के द्वार से आती महिलाओं का एक समूह सब कुछ बदलने वाला था।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की कुछ पल ऐसे आते हैं, जब एक निर्णय पूरे स्वराज्य का भविष्य बदल सकता है। दादोजी के मन में उठी आशंका ने सबको मौन कर दिया।
बाबाजी ने प्राणों से बढ़कर निष्ठा चुनी, जबकि शिवाजी महाराज ने ऐसा उत्तर दिया जिसने मित्र और शत्रु—दोनों को चौंका दिया।
बीजापुर को भेजे गए गुप्त पत्र के पीछे क्या योजना थी? क्या यह स्वराज्य की रक्षा थी या आने वाले किसी बड़े संकट की शुरुआत?
शिवाजी महाराज ने बीजापुर दरबार को अपना पहला गुप्त संदेश क्यों भेजा था—अब उसी रोमांचक कहानी का पिछला अध्याय पढ़िए।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
२२-१
मां साहब को शिवाजी राजे के अचानक आगमन से आश्चर्य
मां साहब को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि राजे अचानक आ गए हैं। रोहिडेश्वर पर कब्ज़ा होने के बाद से राजे हमेशा शिवापुर में ही रहते थे। वे समय-समय पर आते, मिलते और लौट जाते। मां साहब को लगा था कि राजे कुछ और दिनों तक नहीं आएंगे। राजे के इस बीच आ जाने से उनका मन व्याकुल हो गया। शिवाजी राजे के आते ही उन्होंने मां साहब को अपने साथ लिया और एकांत में बैठ गए। राजे चिंतित थे। उन्होंने कहा,
‘मां साहब, ऐसा लगता है कि हमें विदेशियों के पहले अपने ही लोगों का विरोध करना पड़ेगा।’
‘अपने लोग कौन हैं ?’
‘हमारे स्वयं मामा साहब !’
‘कौन, मुधोजिराव ?’ मां साहब ने हैरानी से कहा।
मुधोजीराव का विरोध और स्वराज्य पर संकट
‘हाँ ! हमने रोहिडेश्वर में की गई स्वराज्य की स्थापना उन्हें खटक गई। आदिलशाही के निष्ठावान सेवक हैं ना? उन्होंने मावल क्षेत्र में घूम-घूमकर लोगों को भड़काना शुरू कर दिया है। अब वही हमारे विरोध में शत्रु बनकर खड़े हो रहे हैं।’
‘तब ?’
‘हम और क्या कर सकते हैं ? फलटन में घुड़सवार सेना भेजी है। हम भी वहाँ जा रहे हैं। उन्हें भी पता चल जाएगा कि भोंसले कैसे होते हैं !’
मां साहब की सीख – रिश्तों को बचाने का आग्रह
मां साहब खड़ी हो गईं। काँपते स्वर में उन्होंने कहा, ‘शिवबा ! मैं हाथ जोड़ती हूँ, लेकिन इस मामले को आपसी समझदारी से सुलझाओ। आवेश में आकर कोई गलत कदम मत उठाना। भोसले और जाधव वंश की दुश्मनी भड़की थी, तो दोनों कुलों को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। रिश्ते सहारा देने के लिए बनाए जाते हैं, शत्रुता बढ़ाने के लिए नहीं।’
‘हमने कहां शत्रुता की ? शुरुवात उन्होंने की है।’
‘ऐसा भी तो नहीं कि उसे सुधारा नहीं जा सकता ? दुश्मनी बढ़ाना तो हर किसी के बस की बात होती है, लेकिन उसे निभाने की ताकत बहुत कम लोगों में होती है। उसके लिए भी असाधारण सामर्थ्य चाहिए।’
शिवाजी महाराज का प्रण और मां साहब का आदेश
‘हम घर पर रहें ? होगा वह देखते रहें ?’ राजे ने पूछा।
‘कदापि नहीं। परंतु आप दुश्मनी को खत्म करने जा रहे हो, यह बात याद रखना। आप उस सफलता के साथ लौटना। यह मत भूलना कि मुधोजीराव सईं के पिता हैं, बस यही मेरी राय है।’
‘हम आपके आदेश से बाहर नहीं। हम प्रयास करेंगे। आते हैं।’
राजाओं ने मां साहब के चरण स्पर्श किए; और वे शिबंदी के साथ फलटन के लिए रवाना हुए।
फलटन की सीमा पर पहुंचकर शिवाजी राजे ने क्या देखा?
राजे फलटन की सीमा पर पहुँचे। सीमा पर उनके घुड़सवार थे। पूरा गाँव शांत था।
राजाओं की घुड़सवार सेना कहीं नजर नहीं आ रही थी। राजाओं ने पूछा,
‘सब कहाँ हैं ?’
‘गांव की घेराबंदी कर दी गई है।’ घुड़सवार ने अभिवादन करते हुए कहा, ‘महल के बाहर चौकियां स्थापित कर दी गई हैं।’
‘और निंबालकर ?’
‘आहट मिलते ही वे भाग गए। घुड़सवार सेना उनका पीछा कर रही है।’
‘ठीक है।’ राजे ने ऊपर देखा। बंजर पर नींबू के पेड़ थे। उस ओर इशारा करते हुए राजे ने कहा, ‘हम यहीं रुकेंगे। तुम गांव जाओ। महल पर तैनात सभी चौकियाँ हटा दो और उन्हें यहाँ भेज दो। एक काम कहो, तो दूसरा ही कर बैठते हैं।’
घुड़सवार चला गया। थोड़ी देर बाद, सभी पहरेदार लिंबा की ओर आते हुए दिखाई दिए। हवा गर्म थी। गर्म हवाएं चल रही थीं। फलटन उस तेज धूप में झुलसकर बैठा था। गाँव की परिधि टेढ़े-मेढ़े मोड़ लेते हुए उसे चारों ओर से घेरे खड़ी थी। गाँव के द्वार से आती महिलाओं को देखते ही शिवाजी राजे संभलकर खड़े हो गए। समूह नज़र आया और शिवाजी राजे ने उन्हें पहचान लिया।
आगे की कहानी?
फलटन के द्वार से आती महिलाओं को देखते ही शिवाजी महाराज ठिठक गए। उनके चेहरे पर आश्चर्य और गंभीरता एक साथ दिखाई देने लगी।
क्या इन महिलाओं का आगमन रक्तपात रोकने आया था, या वे किसी ऐसे संदेश के साथ आई थीं जो पूरे स्वराज्य की दिशा बदल देता?
एक ओर कर्तव्य था, दूसरी ओर रिश्तों का बंधन। तलवार उठाने से पहले शिवाजी महाराज को ऐसा निर्णय लेना था, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों तक रहने वाला था।
आखिर उन महिलाओं में कौन था, जिसे देखते ही शिवाजी महाराज का हृदय बदल गया? इसका रहस्य अगले भाग में सामने आएगा।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – स्वराज्य के संस्थापक और दूरदर्शी योद्धा, जिन्होंने न्याय, नीति और धर्म को सर्वोपरि रखा। हर निर्णय में प्रजा और स्वराज्य का हित ही उनका लक्ष्य था।
- राजमाता जिजाबाई (मां साहब) – शिवाजी महाराज की माता और उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा। उन्होंने हमेशा युद्ध से पहले विवेक, संयम और पारिवारिक मूल्यों का मार्ग दिखाया।
- मुधोजीराव निंबालकर – रानी सईबाई के पिता और शिवाजी महाराज के ससुर जी। आदिलशाही के प्रति निष्ठा के कारण वे स्वराज्य के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
स्वराज्य के प्रारंभिक काल में शिवाजी महाराज को केवल विदेशी शक्तियों से ही नहीं, बल्कि अपने ही संबंधियों और स्थानीय सरदारों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। फलटन की यह घटना बताती है कि स्वराज्य की स्थापना केवल युद्ध जीतने का कार्य नहीं था, बल्कि लोगों का विश्वास जीतना भी उतना ही आवश्यक था। राजमाता जिजाबाई की सीख यह सिद्ध करती है कि सच्चा नेतृत्व केवल तलवार की शक्ति से नहीं, बल्कि धैर्य, नीति और रिश्तों को संभालने की क्षमता से भी बनता है। यही गुण आगे चलकर मराठा साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत बने।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि जीवन में सबसे कठिन संघर्ष कई बार अपनों के साथ ही होता है। ऐसे समय में क्रोध नहीं, बल्कि धैर्य और विवेक सबसे बड़ा हथियार बनते हैं।
- शिवाजी महाराज ने मां साहब की सलाह को सम्मान देकर यह दिखाया कि महान नेता वही होता है, जो भावनाओं पर नियंत्रण रखकर सही निर्णय ले।
- रिश्तों को बचाने का प्रयास करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अन्याय का सामना करना।
- नेतृत्व का वास्तविक अर्थ शक्ति और संवेदनशीलता के संतुलन में छिपा है।
निष्कर्ष
फलटन का यह प्रसंग केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं था, बल्कि स्वराज्य के भविष्य की निर्णायक परीक्षा थी। शिवाजी महाराज ने कर्तव्य और रिश्तों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया, जबकि राजमाता जिजाबाई ने उन्हें संयम का मार्ग दिखाया। आगे क्या हुआ, यही इस ऐतिहासिक कथा का सबसे रोमांचक मोड़ बनने वाला है।
विशेष संवाद
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