किले पर कब्जे की चाल पहरेदार को किस बात पर हुआ शक? सब हो गए सतर्क!
किले पर कब्जे की चाल पहरेदार को किस बात पर हुआ शक? सब हो गए सतर्क!
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| किले पर कब्जे की चाल पहरेदार को किस बात पर हुआ शक? सब हो गए सतर्क! |
भोर होते ही किले के द्वार खुले, लेकिन कुछ लोगों की चाल में एक छिपा हुआ रहस्य था।
शिवाजी महाराज के वीर साधारण भारवाही बनकर किले में प्रवेश कर रहे थे, जबकि हर कदम पर खतरा मंडरा रहा था।
एक सतर्क पहरेदार को कुछ अजीब लगा। उसकी शंका बढ़ती गई और उसने एक बोझ रुकवा लिया।
क्या उसी क्षण पूरी योजना उजागर होने वाली थी, या इतिहास एक नया मोड़ लेने वाला था?
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की राजे ने गुप्त रूप से हथियारों का विशाल भंडार तैयार कराया। भीमा की निष्ठा और स्वराज्य के लिए उसका समर्पण देखकर शिवाजी महाराज भावुक हो उठे।
भोर से पहले रोहिडेश्वर की तलहटी में सैकड़ों मावले एकत्र हुए। हर ओर रहस्य, उत्साह और आने वाले अभियान की आहट थी।
तानाजी, येसाजी और अन्य वीरों ने किले को चारों ओर से घेरने की योजना बना ली। अब बस संकेत मिलने की देर थी।
लेकिन शिवाजी महाराज का पहला लक्ष्य कौन सा किला था? और क्या यह अभियान स्वराज्य के इतिहास की पहली बड़ी जीत बनने वाला था? जानिए कैसे शिवाजी महाराज ने इस साहसी गुप्त अभियान की नींव रखी थी।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१८-४
भोर होते ही गुप्त अभियान की शुरुआत
भोर होते ही किले का द्वार खुलने का नगाड़ा वातावरण में गूंज उठा। राजे शांत थे। एक भारवाही उठ खड़ा हुआ। उसने राजे को प्रणाम किया, सिर पर अपना बोझ रखा और आगे बढ़ गया। कुछ ही समय बाद दो अन्य भारवाही भी निकल पड़े। अधीर भीमा ने पूछा,
‘राजे, मैं जाऊँ ?’
‘जाओ ! समझदारी से काम लो। बिना चेतावनी मिले कुछ भी मत करो।’
‘उस बारे में चिंता मत करो।’
कुछ और बोझ गए; और भीमा ने बोझ उठा लिया। राजे ने कहा,
‘तलवार ली है न ?’
भीमा मुस्कुराया और बोझ की ओर उंगली से इशारा किया।
सूरज क्षितिज से ऊपर आने तक जंगल में केवल राजा, दादाजी, येसाजी और पचास युवक ही बचे थे।
किले की ओर बढ़ते शिवाजी महाराज
जंगल पर सूरज की रोशनी पड़ रही थी। जंगल में नए पत्तों के विभिन्न रंग दिखाई दे रहे थे। येसाजी ने राजे को संकेत किया। राजे ने अपनी तलवार मस्तक से लगाई और किले की दिशा में आगे बढ़ने लगे। उनका प्रत्येक कदम अत्यंत सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा था।
किले के द्वार पर सामान्य दिनचर्या
किले के मुख्य द्वार पर तैनात चौकीदार और पहरेदार द्वार की देवड़ी में बैठकर चिलम पी रहे थे। बोझ उठाए मजदूर भीतर प्रवेश कर रहे थे। वर्षा ऋतु अब निकट थी, इसलिए किले पर मरम्मत और आवश्यक व्यवस्थाओं का कार्य आरंभ हो चुका था। बोझ लेकर आने वाले लोग सीधे किले के भीतर जा रहे थे। किन्तु जैसे-जैसे बोझ उठाए लोगों की संख्या बढ़ने लगी, एक पहरेदार का ध्यान उनकी ओर गया।
‘अरे ! आजतक मूर्ख की तरह सो रहे थे ? किले पर कितने बोझ ढो रहे हैं ?’
संदेह की पहली चिंगारी
फिर एक और बोझ आया। पहरेदार ने हाथ रोका।
‘कहां का बोझ ?’
‘यही का !’ भारवाही ने कहा।
‘गांव ?’
‘मावल !’
भारवाही अंदर गया। पीछे-पीछे तीन व्यक्ति उनके सिर पर मुंडासे बंधे थे, वे सलीकेदार वस्त्र पहने हुए थे, कमर में तलवार और हाथ में भाला धारण किए हुए थे वह भी किले में प्रवेश कर गए। । वे पहरेदार की ओर देखे बिना ही आगे बढ़ने लगे। यह देखकर पहरेदार ने ऊँची आवाज़ में पुकारा,
‘सुनो !’
‘क्या कहते हो ?’
‘क्या कहे ? तुम तो अपने ही घर की तरह सीधे भीतर चले जा रहे हो ! कौन हो तुम ? कहाँ से आए हो ? कुछ बताएंगे या नहीं ? जा कहाँ रहे हो ?’
विवाह का बहाना और छिपा हुआ रहस्य
‘कहाँ ? विवाह निश्चित करने जा रहे है हम !’
‘हां ! परंतु किसका ?’
‘किले का।’
‘आँ !’
‘किले का बेटा है, तो किले का ही हुआ न !’
पहरेदार हँस पड़े। उनमें से एक बोला, ‘अच्छा, जब विवाह हो तो हमें भी बुलाना मत भूलना।’
‘आप लोगों के बिना विवाह संपन्न हो सकता है क्या ?’ ऐसा कहते हुए तीनों अपनी मूँछों पर ताव देते हुए किले पर गए।
पहरेदार की बढ़ती शंका
एक पहरेदार के मन में संदेह था। उसे कुछ न कुछ असामान्य प्रतीत हो रहा था। ये भारवाही, और उनके पीछे विवाह तय करने जाने का बहाना बनाकर भीतर प्रवेश करने वाले हथियारबंद व्यक्ति—यह सब उसे खटक रहा था। परंतु वह स्पष्ट रूप से कुछ समझ नहीं पा रहा था। उसी समय एक और बोझ किले के भीतर प्रवेश कर गया। अब पहरेदार की शंका और गहरा गई। वह तुरंत चबूतरे से कूद पड़ा और ऊँचे स्वर में चिल्लाया,
‘सुनो, रुको !’
भारवाही रुक गया।
‘बोझ लेकर कहा जा रहे हो ?’
‘अंदर !’
‘वह दिख रहा है मुझे। परंतु किसके घर ?’
‘वाडे में !’
‘चौकीदार के ?’
‘हां।’
‘कल हवालदार ने वर्दी दी, वही बोझ।’
‘हां।’ भारवाही ने कहा।
क्या अब खुल जाएगा पूरा रहस्य?
‘बोझ नीचे रख दो।’
बोझ नीचे फेंक दिया गया। पहरेदार चिल्लाया।
‘बोझ छोड़ो।’
बरामदे में बैठे सभी लोग हंस रहे थे। उनमें से एक ने कहा,
‘राम्या, तुम उसे क्यों परेशान कर रहे हो ? उसे जाने दो।’
आगे की कहानी?
पहरेदार की नजर अब बोझ पर टिक चुकी थी।
एक छोटी-सी गलती योजना पर पानी फेर सकती थी।
किले के भीतर छिपे वीर सांस रोककर अगले पल का इंतजार कर रहे थे।
क्या रहस्य उजागर होगा, या शिवाजी महाराज की सबसे साहसी चाल इतिहास रचेगी?
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – हिंदवी स्वराज्य के महान संस्थापक और अद्वितीय रणनीतिकार। कठिन परिस्थितियों में भी साहस, बुद्धिमत्ता और दूरदृष्टि से कार्य करने वाले युवा नेतृत्वकर्ता।
- भीमा – शिवाजी महाराज के विश्वसनीय और निडर मावलों में से एक। गुप्त अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला साहसी योद्धा।
- येसाजी – राजे के भरोसेमंद साथी और रणनीतिक सहयोगी। संकट की घड़ी में सूझबूझ और निष्ठा का परिचय देने वाले वीर मावला।
- दादाजी – अनुभवी मार्गदर्शक और स्वराज्य के प्रति समर्पित व्यक्तित्व। शिवाजी महाराज के प्रारंभिक अभियानों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
- सतर्क पहरेदार – किले की सुरक्षा का जिम्मेदार सैनिक। उसकी तीक्ष्ण नजर और बढ़ता संदेह पूरे अभियान के लिए खतरा बन सकता था।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
शिवाजी महाराज के प्रारंभिक स्वराज्य अभियानों में गुप्त रणनीति और बुद्धिमत्ता का विशेष स्थान था। यह प्रसंग दर्शाता है कि केवल बल के आधार पर नहीं, बल्कि चतुर योजना, धैर्य और मनोवैज्ञानिक युद्धकौशल के माध्यम से भी किलों पर विजय प्राप्त की जा सकती थी। मावलों का साधारण भारवाही बनकर किले में प्रवेश करना मराठा सैन्य नीति की अनोखी मिसाल है। इस प्रकार के अभियानों ने आगे चलकर स्वराज्य के विस्तार की मजबूत नींव रखी। यह घटना शिवाजी महाराज की दूरदर्शिता, संगठन क्षमता और जोखिम उठाने के साहस को उजागर करती है, जिसने मराठा साम्राज्य के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि किसी भी बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल शक्ति पर्याप्त नहीं होती, बल्कि सही योजना, धैर्य और समय की पहचान भी आवश्यक होती है।
- शिवाजी महाराज और उनके मावलों ने दिखाया कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी साहस बनाए रखना चाहिए।
- टीमवर्क, अनुशासन और नेतृत्व किसी भी सफलता की आधारशिला होते हैं।
- साथ ही यह भी सीख मिलती है कि छोटी-सी असावधानी बड़े संकट को जन्म दे सकती है, इसलिए हर कार्य में सतर्कता और विवेक बनाए रखना चाहिए।
निष्कर्ष
किले में प्रवेश का यह गुप्त अभियान शिवाजी महाराज की अद्भुत रणनीति और उनके मावलों की निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण है। हर क्षण खतरे से भरा था, फिर भी सभी वीर अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे। यह घटना केवल एक सैन्य योजना नहीं, बल्कि स्वराज्य के लिए समर्पण, साहस और बलिदान की प्रेरक गाथा है। आने वाले घटनाक्रम में यही अभियान इतिहास की दिशा बदलने वाला साबित हो सकता है।
विशेष संवाद
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