पुरंधर जीतने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने रची कैसी गुप्त चाल?
पुरंधर जीतने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने रची कैसी गुप्त चाल?
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| पुरंधर जीतने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने रची कैसी गुप्त चाल? |
राजनीति, विश्वास और रिश्तों के बीच एक ऐसी रात आई, जब एक निर्णय ने पुरंधर का भविष्य बदल दिया। मित्रता के पीछे छिपी चाल किसी ने नहीं पहचानी।
निलोजी का अहंकार और शिवाजी महाराज की धैर्यपूर्ण नीति आमने-सामने आई। बिना तलवार उठाए ऐसा दांव चला, जिसने सबको स्तब्ध कर दिया।
उधर रानी सईबाई के साथ पड़वा का भावुक क्षण, और इधर पुरंधर के भाग्य का अंतिम फैसला—एक ही रात में इतिहास नई दिशा लेने वाला था।
अब जानिए, उसी कहानी का अगला रोमांचक अध्याय, जहाँ असली खेल शुरू होता है।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की पुरंधर की दीवारों के भीतर दीपावली की रोशनी थी, पर शिवाजी महाराज की नज़र किसी और लक्ष्य पर थी।
मित्रता, विश्वास और पारिवारिक विवाद के बीच एक ऐसी गुप्त योजना आकार ले रही थी, जिसे कोई समझ न सका।
निलोजी का निमंत्रण स्वीकार तो हुआ, लेकिन राजे के हर शब्द के पीछे छिपा था भविष्य का एक बड़ा रहस्य।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
०१-३
निलोजी का अडिग निर्णय और बढ़ता विवाद
‘नहीं, राजे। हमारी मित्रता और राजनीति अलग-अलग हैं। हम आदिलशाही के वफादार सेवक हैं। इसमें कोई अंतर नहीं होगा।’
राजे हँसे। कहा,
‘ठीक है। हम ज़ोर नहीं देते। परंतु, निलोजी, कम से कम अपने लोगों को तो आश्रय देंगे, या नहीं ?’
थोड़े नशे में चूर निलोजी बोले, ‘राजे, बँटवारा कैसा ? हम तो बड़े हैं। गद्दी के स्वामी हम हैं। ये तो हमारे आश्रित हैं। रहना हो तो रहें। नहीं तो...’
‘लेकिन कहाँ जाएँ ?’
‘रास्ता खुला है, जहाँ जाना हो चले जाएँ ! राजे, इन्हें इतना सीधा-सादा मत समझिए। पिता के देहांत के बाद, मुझे बताए बिना इन्होंने बीजापुर दरबार से बातचीत शुरू कर दी थी।’
‘तो हम क्या खाएं ?’
राजे ने कहा, ‘रुको ! आज त्योहार है, इतना कड़वा मत बनो।’
राजनीतिक योजना और गुप्त निर्णय
राजाओं ने लड़ाई को बढ़ने नहीं दिया। रात में दावत का आयोजन किया गया। राजे रात भर किले में ही रुके। अगले दिन, जब वे किले का निरीक्षण कर रहे थे, पिलाजी राजाओं के पास पहुँचे। वे निराश थे। पिलाजी राव ने कहा,
‘राजे, अब आगे क्या ?’
‘आपने देख लिया ! मुझे नहीं लगता कि निलोजी राव कुछ करेंगे।’
‘राजे, आप ही ऐसे...’
‘पिलाजी राव, इसका एक ही उपाय है। साम, दाम, भेद, दंड। अगर आप तैयार हैं, तो निलोजी राव को रात में कैद कर दीजिए। हमारे लोग हैं। वे आपकी मदद करेंगे। आप सोचो। फिर मुझे क्या बताओ।’
पिलाजी राव ने तुरंत इसे मंजूरी दे दी।
रात का रहस्य और निलोजी की गिरफ्तारी
रात गहराने तक निलोजी राव भरपूर मदिरापान करके लड़खड़ाते हुए अपने कक्ष में जाकर सो गए। राजे भी अपनी शय्या पर विश्राम करने चले गए। पिलाजी और संकराजी ने राजे के विश्वस्त सैनिकों को महल के भीतर बुला लिया और गहरी नींद में सोए निलोजी राव को दबोच लिया गया। राजे को जगाया गया। जब वे वहाँ पहुँचे, तो निलोजी बँधे हुए खंभे से जकड़े खड़े थें। आँखों में अंगार था। निलोजी एकाएक उछल पड़े।
‘राजे, यह विश्वासघात है ! धोखा दिया।’
‘नहीं, निलोजी धोखा मैने दिया नहीं। अगर आप मान जाते, तो यह दोष अपने भाइयों पर नहीं लगता। पिलाजी, संकराजी, निलोजी को नियंत्रण में रखें। त्योहार के बाद हम बाकी सब पर फैसला लेंगे।’
पिलाजी और संकराजी खुशी से बेहोश हो रहे थे। उन्हें स्वर्ग हाथ लगने का संतोष था।
पड़वा का निमंत्रण और छिपी हुई योजना
अगले दिन राजे ने कहा,
‘पिलाजी, संकराजी !’
‘जी !’
‘हम चाहते हैं कि आज, पड़वा, आप दोनों हमारे यहां आज आतिथ्य सत्कार के लिए आएं। कल सुबह लौट आएंगे।’
‘जैसी आज्ञा !’
शाम को राजे, पिलाजी और संकराजी के साथ शिवापुर आए। वर्दी पहले ही दी गई थी। राजे के आने से मां साहब भी प्रसन्न थे। हंसते, बातें करते हुए भोजन किया। पिलाजी और संकराजी सो गए। राजे अपने महल में आए।
रानी सईबाई का औक्षण और शुभ अंगूठी
रानी सईबाई खड़ी थीं। एक चांदी का पाट रखा गया। आरती दिखाई दे रही थी। राजे ने कहा,
‘यह क्या है ?’
‘क्या तुम्हें कभी घर की याद आती है ? आज पड़वा है !’
‘तो फिर ?’
‘आज आपका औक्षण करना है।’
‘हम भाग्यशाली हैं।’
कहकर राजे पाट पर बैठ गए। रानी सईबाई ने राजाओं का औक्षण किया। राजे ने पूछा,
‘इस थाल में क्या रखूँ ?’
‘जो मन करे।’
राजे ने अपनी उँगली से मूंगे की अंगूठी उतारी। रानी सईबाई ने थाल नीचे पाट पर रख दिया। राजे ने अंगूठी अपने हाथों से रानी सईबाई की उँगली में पहना दी। राजे ने कहा,
‘सई ! यह शुभ अंगूठी है। रोहिडेश्वर के दिन पहनी थी। हमें किला प्राप्त हुआ। तुम्हें क्या प्राप्त होता है, देखना।’
रानी सईबाई लज्जित हुए।
पुरंधर के भविष्य का रहस्यमय संकेत
बात बदलते हुए वे बोले,
‘लगता है, पिलाजी राव और संकराजी राव के लिए पड़वा के शुभ मुहूर्त पर पुरंधर का यह अंतिम भोजन था।’
‘मतलब ?’
‘यदि ऐसा न होता, तो वे यहाँ क्यों आते।’
आगे की कहानी?
पुरंधर की रात अभी खत्म नहीं हुई थी, असली खेल अब शुरू होने वाला था।
एक निर्णय कई रिश्तों, वफादारियों और सत्ता का भविष्य बदलने वाला था।
शिवाजी महाराज की अगली चाल इतिहास में अमर हुई, लेकिन उसका परिणाम किसी ने नहीं सोचा था।
क्या अगले ही पल पुरंधर पूरी तरह स्वराज्य का हो गया? जानिए अगले अध्याय में यह रोमांचक रहस्य।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – स्वराज्य के महान संस्थापक और अद्भुत रणनीतिकार। बिना अनावश्यक रक्तपात के विजय प्राप्त करना उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। बुद्धिमत्ता, धैर्य और दूरदृष्टि उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र था।
- निलोजी राव – पुरंधर किले के अधिकारधारी और आदिलशाही के वफादार सेवक। अहंकार और कठोर निर्णयों ने उन्हें अपने ही भाइयों से दूर कर दिया। उनकी एक भूल ने इतिहास की दिशा बदल दी।
- पिलाजी राव – निलोजी के भाई और न्याय की आशा रखने वाले व्यक्ति। उन्होंने शिवाजी महाराज पर विश्वास कर निर्णायक कदम उठाया। उनका निर्णय पुरंधर विजय की नींव बना।
- संकराजी राव – पिलाजी के भाई और स्वराज्य समर्थक। उन्होंने गुप्त योजना को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी निष्ठा ने पूरे अभियान को सफलता तक पहुँचाया।
- रानी सईबाई – शिवाजी महाराज की धर्मपत्नी और जीवनसंगिनी।उनका पड़वा औक्षण इस ऐतिहासिक प्रसंग का भावनात्मक पक्ष बन गया। मूंगे की शुभ अंगूठी वाला क्षण इस अध्याय की सबसे यादगार घटना है।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
पुरंधर किले से जुड़ी यह घटना केवल एक राजनीतिक योजना नहीं थी, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज की अद्भुत कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण भी थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि हर युद्ध तलवार से नहीं जीता जाता, बल्कि धैर्य, विश्वास और सही समय पर लिए गए निर्णय से भी विजय प्राप्त की जा सकती है। निलोजी की गिरफ्तारी के बाद स्वराज्य के विस्तार का मार्ग और अधिक मजबूत हुआ। यह प्रसंग मराठा इतिहास में इसलिए विशेष माना जाता है क्योंकि इसमें रक्तपात के बिना सत्ता परिवर्तन का दुर्लभ उदाहरण देखने को मिलता है। यही नीति आगे चलकर स्वराज्य की सफलता का आधार बनी।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह घटना सिखाती है कि केवल शक्ति ही विजय का मार्ग नहीं होती, बल्कि बुद्धिमत्ता, धैर्य और सही रणनीति भी असंभव लगने वाली परिस्थितियों को बदल सकती है।
- शिवाजी महाराज ने व्यक्तिगत संबंधों और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखा तथा अनावश्यक युद्ध से बचते हुए उद्देश्य प्राप्त किया।
- नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेना भी है।
- यही गुण किसी भी व्यक्ति को सामान्य से असाधारण बना देते हैं।
निष्कर्ष
पुरंधर का यह प्रसंग बताता है कि महान नेतृत्व केवल वीरता से नहीं, बल्कि विवेक, संयम और दूरदृष्टि से बनता है। शिवाजी महाराज ने बिना बड़े युद्ध के ऐसी रणनीति अपनाई जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। यही कारण है कि उनकी प्रत्येक योजना आज भी नेतृत्व, राजनीति और जीवन-प्रबंधन की प्रेरणा मानी जाती है।
विशेष संवाद
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