कैसे बिना लढ़े पुरंधर किला जीत लिया? जाने शिवाजी महाराज का रहस्य!

कैसे बिना लढ़े पुरंधर किला जीत लिया? जाने शिवाजी महाराज का रहस्य!

कैसे बिना लढ़े पुरंधर किला जीत लिया? जाने शिवाजी महाराज का रहस्य!
कैसे बिना लढ़े पुरंधर किला जीत लिया? जाने शिवाजी महाराज का रहस्य!

पुरंधर की दीवारों के भीतर दीपावली की रोशनी थी, पर शिवाजी महाराज की नज़र किसी और लक्ष्य पर थी।

मित्रता, विश्वास और पारिवारिक विवाद के बीच एक ऐसी गुप्त योजना आकार ले रही थी, जिसे कोई समझ न सका।

निलोजी का निमंत्रण स्वीकार तो हुआ, लेकिन राजे के हर शब्द के पीछे छिपा था भविष्य का एक बड़ा रहस्य।

क्या उसी दीपावली की रात पुरंधर का भाग्य बदल गया?


पिछले लेख में?

पिछले लेख में हमने पढ़ा की दादोजी कोंडदेव के निधन ने केवल लाल महल ही नहीं, बल्कि शिवाजी राजे के हृदय को भी सूना कर दिया। हर कोना उनकी स्मृतियों से गूंज रहा था।

लेकिन यही शोक जल्द ही स्वराज्य की सबसे बड़ी शक्ति बन गया। राजाओं ने आँसू छिपाकर एक ऐसी गुप्त योजना बनाई, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

कोंढाणा बिना युद्ध के स्वराज्य में कैसे आया? इस रहस्य के पीछे कौन-सी अद्भुत रणनीति और किसकी निर्णायक भूमिका थी? इसका उत्तर आपको चौंका देगा।

जानिए स्वराज्य विस्तार का यह रोमांचक और रहस्यमयी अध्याय।



लेख का विस्तृत सारांश

०१-२

पुरंधर किले में उत्तराधिकार का विवाद

पुरंधर पर शहाजी महाराज और दादोजी के मित्र नीलकंठराव थे। इसलिए, राजे पुरंधर को छू भी नहीं सकते थे। नीलकंठराव की मृत्यु हो गई। उनके तीन पुत्र निलोजी, संकराजी और पिलाजी थे। अपने पिता के बाद, निलोजी किले के मालिक बन गए। लेकिन वह अपने दोनों भाइयों को हिस्सा देने को तैयार नहीं थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि राजे खेड़बारा आए हैं, पिलाजी और संकराजी की राजे के पास आवाजाही बढ़ने लगी। निलोजी राजे के प्रति आज्ञाकारी थे। दोनों भाइयों का उद्देश्य राजे की मध्यस्थता से आय प्राप्त करना था। राजे ने दोनों भाइयों को आश्वासन दिया।

शिवाजी महाराज का गुप्त आश्वासन

राजे ने कहा,

‘पिलाजी, हम आपकी मदद जरूर करेंगे। लेकिन हम तीसरे स्थान पर हैं। अगर किसी कारणवश आप हमें किले में बुलाते हैं, तो हम निलोजीराव से बात कर देंगे।’

पिलाजी ने कहा, ‘राजे, दिवाली नजदीक है। हम उस अवसर पर आपको बुलाएंगे।’

‘ठीक है ! हम दिवाली पर किले के नीचे स्थित नारायण मंदिर में देवताओं के दर्शन के लिए आएंगे। हम निलोजी को भी संदेश भेज देंगे। दिवाली के पांचों दिन आपके साथ बिता सकते हैं।’

निर्णय हो गया।

नारायण मंदिर में पहली मुलाकात

दिवाली से एक दिन पहले, राजे योजना के अनुसार नारायण दर्शन के लिए गए। तीनों भाई मंदिर के सामने राजे की प्रतीक्षा कर रहे थे। राजाओं के साथ शिबंदी थी। येसाजी, तानाजी, जिउ महाला, संभाजी कावजी थे। राजाओं को भगवान के दर्शन हुए। मंदिर में स्थापित बैठक पर राजे बैठ गए। राजे ने कहा,

‘निलोजी ! हम खेड़बारा आए थे, लेकिन आपसे मुलाकात नहीं हुई। अगर नीलकंठराव होते तो ऐसा नहीं करते।’

‘राजे, क्षमा करें। दिन उत्सव के है। विश्वातघात के है।’ दोनों भाइयों की ओर देखते हुए निलोजी ने कहा, ‘किले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती।’

‘फिर हमें बुलाते थे। हम आ जाते थे।’

‘आप गढ़ के नीचे आने वाले हैं, पता चला। इसी कारण आए हैं। दीपावली का पर्व है। यह शुभ उत्सव गढ़ पर ही मनाएँ। यही हमारी विनती है।’

‘निश्चय ही, क्यों नहीं ? लेकिन त्योहार के अवसर पर हम अकेले कैसे आ सकते हैं ? हमारे साथ हमारे सभी साथी भी हैं।’

‘गढ़ के लिए आपकी शिबंदी बोझ नहीं है। इसमें संकोच न करें...’ निलोजी ने कहा।

पुरंधर जाने का निमंत्रण स्वीकार

राने ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया; और वे खेड़बारा लौट गए। दिवाली के पहले दिन राजाओं ने स्नान किया और नाश्ता किया। भोजन के बाद, राजे ने मां साहब के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया और पुरंधर के लिए रवाना हो गए। साथ में डेढ़ सौ घुड़सवार थे। आस्थावान लोग थे।

पुरंधर किले का भव्य स्वागत

निलोजी राजाओं का स्वागत करने के लिए आगे आए। राजे गढ़ पर गए। गढ़ पर चढ़ते समय उनकी दृष्टि गढ़ पर टिकी रहीं। गढ़ विशाल और मजबूत था। तहखाना काफी बड़ा था। मुख्य द्वार से राजे ने गढ़ में प्रवेश किया। परकोट में निलोजी का विशाल महल था। तीन पहाड़ियों से सजे परकोट को देखकर राजे आश्चर्यचकित रह गए। गढ़ अच्छी तरह से किलेबंद था। हर बुर्ज पर तोपें तैनात थीं। इसलिए गढ़ में शिबंदी बहुत कम थी। राजे ने निलोजी के साथ गढ़ का निरीक्षण किया।

दीपावली की दावत और निलोजी का आग्रह

रात्रि में भोज से पहले निलोजी ने संकोच में राजाओं से पूछा,

‘राजे, थोड़ा मद्य ग्रहण करें ? दीपावली का शुभ पर्व है।’

‘निलोजी, आप निःसंकोच होकर मद्य ग्रहण करें। हमें ऐसी आदत नहीं है। हम तो शरबत ही लेंगे।’

निलोजी मद्यपान कर रहे थे, पिलाजी और संकराजी राजाओं की ओर देख रहे थे। निलोजी ने कहा,

पुरंधर की शक्ति पर निलोजी का गर्व

‘राजे, अनेक गढ़ पर विजय प्राप्त की है, लेकिन पुरंधर जैसा गढ़ कहीं देखा है क्या ?’

‘ऐसा विशाल गढ़ हमारे पास कहाँ है ? यदि कभी ऐसा समय आया, तो क्या आप हमारे लिए पराए होंगे ? कभी भी आपके आश्रय में आएँगे।’

आगे की कहानी?

दीपावली की मुस्कान के पीछे एक ऐसा निर्णय छिपा था, जिसने इतिहास की दिशा बदलने की तैयारी कर ली थी।

निलोजी ने जिसे केवल सम्मान समझा, शिवाजी महाराज उसे भविष्य के अवसर के रूप में देख रहे थे।

विश्वास की यह डोर कब राजनीति की सबसे बड़ी चाल बन गई, इसका आभास किसी को भी नहीं हुआ।

क्या अगली ही मुलाकात में बिना युद्ध पुरंधर शिवाजी महाराज के अधिकार में आ गया? जानिए अगले भाग में।

कैसे बिना लढ़े पुरंधर किला जीत लिया? जाने शिवाजी महाराज का रहस्य!
कैसे बिना लढ़े पुरंधर किला जीत लिया? जाने शिवाजी महाराज का रहस्य!

प्रमुख पात्र और उनका परिचय

  • छत्रपति शिवाजी महाराज – दूरदर्शी, साहसी और अद्भुत रणनीतिकार, जिन्होंने बुद्धिमत्ता से स्वराज्य का विस्तार किया।
  • निलोजी – पुरंधर किले के स्वामी, जिन्होंने दीपावली पर शिवाजी महाराज का सम्मानपूर्वक स्वागत किया।
  • पिलाजी और संकराजी – निलोजी के भाई, जिन्होंने पारिवारिक विवाद के समाधान के लिए शिवाजी महाराज की मध्यस्थता चाही।

लेख का ऐतिहासिक महत्व

पुरंधर किले की यह घटना छत्रपति शिवाजी महाराज की असाधारण कूटनीति और धैर्य का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। उन्होंने बल प्रयोग के बजाय विश्वास, संवाद और सही अवसर का चयन किया। निलोजी तथा उनके भाइयों के बीच चल रहे विवाद को समझकर शिवाजी महाराज ने स्वयं को एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया। दीपावली के निमंत्रण ने उन्हें पुरंधर किले की बनावट, सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक स्थिति का निकट से अध्ययन करने का अवसर दिया। आगे चलकर यही जानकारी स्वराज्य विस्तार में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। यह प्रसंग बताता है कि शिवाजी महाराज केवल महान योद्धा ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और कुशल रणनीतिकार भी थे।

इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • यह घटना सिखाती है कि बड़ी जीत केवल तलवार से नहीं, बल्कि धैर्य, विश्वास और बुद्धिमत्ता से भी प्राप्त की जा सकती है।
  • शिवाजी महाराज ने जल्दबाज़ी करने के बजाय सही समय की प्रतीक्षा की और परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ा।
  • किसी भी कठिन परिस्थिति में संयम बनाए रखना, लोगों का विश्वास जीतना और अवसर की पहचान करना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।
  • यही गुण किसी भी व्यक्ति को जीवन और समाज में सफल बना सकते हैं।

निष्कर्ष

पुरंधर की दीपावली केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं थी, बल्कि स्वराज्य के भविष्य की नींव रखने वाला ऐतिहासिक क्षण थी। शिवाजी महाराज ने अपने व्यवहार, विनम्रता और दूरदर्शिता से यह सिद्ध कर दिया कि महान नेतृत्व शक्ति से पहले बुद्धि का उपयोग करता है। आने वाली घटनाएँ इस मुलाकात को इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में बदलने वाली थीं।


विशेष संवाद


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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न : पुरंधर किले का स्वामी उस समय कौन था?

उत्तर : पुरंधर किले का स्वामी नीलकंठराव के निधन के बाद उनके पुत्र निलोजी बने थे।

प्रश्न : शिवाजी महाराज पुरंधर किले में किस अवसर पर गए थे?

उत्तर : वे दीपावली के अवसर पर निलोजी के निमंत्रण पर पुरंधर किले गए थे।

प्रश्न : इस घटना का सबसे बड़ा महत्व क्या है?

उत्तर : यह घटना शिवाजी महाराज की दूरदर्शी कूटनीति, धैर्य और स्वराज्य विस्तार की रणनीति को उजागर करती है।


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