रानी सईबाई से मिलन, फिर मनोहारी को देखकर क्यों रुके शिवाजी महाराज?
रानी सईबाई से मिलन, फिर मनोहारी को देखकर क्यों रुके शिवाजी महाराज?
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| रानी सईबाई से मिलन, फिर मनोहारी को देखकर क्यों रुके शिवाजी महाराज? |
रोहिडेश्वर की विजय के बाद पूरे वाड़े में उत्सव था, लेकिन रानी सईबाई की आँखें केवल अपने स्वामी की एक झलक पाने को व्याकुल थीं।
मिलन का वह भावुक क्षण आया, पर तभी राजे की नज़र मनोहारी पर ठहर गई। आखिर ऐसा क्या था जिसने उन्हें अचानक रोक दिया?
क्या मनोहारी केवल एक दासी थी, या उसके पीछे छिपा था कोई पुराना रहस्य, जिसे पहचानते ही राजे चौंक उठे?
आगे जो हुआ, उसने इस विजय के उत्सव को और भी रहस्यमय बना दिया। पूरी घटना जानने के लिए यह अध्याय अवश्य पढ़ें।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की दादोजी कोंडदेव को अचानक एक ऐसी खबर मिली, जिसने पूरे वाड़े में हलचल मचा दी। किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है।
रानी जिजाबाई के मन में गर्व और चिंता, दोनों भाव एक साथ उमड़ पड़े। शिवबा ने आखिर कौन-सा साहसिक कदम उठा लिया था?
रोहिडेश्वर किले से जुड़ी यह घटना स्वराज्य के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत बनने वाली थी। लेकिन इसकी कीमत क्या चुकानी पड़ती?
जब सच्चाई सामने आई, तो सब स्तब्ध रह गए। आखिर शिवाजी महाराज ने रोहिडेश्वर कैसे जीता और आगे क्या होने वाला था?
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१९-२
रोहिडेश्वर विजय की खुशखबर
मां साहब ने कहा,
‘सईं, जल्दी अच्छे कपड़े पहनिए। आरती की तैयारी कीजिए।’
‘किसकी आरती उतारनी है ?’
‘मेरी आरती उतारो अब ! अरी समझदार, तुम्हारे स्वामी पराक्रम करके घर लौट रहे हैं। उनकी आरती उतारो। राजे ने रोहिडेश्वर किले पर विजय प्राप्त कर ली है।’
रानी सईबाई की उत्सुकता और मनोहारी की चुटकी
रानी सईबाई उत्सव के सुंदर वस्त्र पहनकर तैयार हो गईं। मनोहारी एक-एक करके उनके शरीर पर आभूषण सजा रही थी। तभी रानी सईबाई ने पूछा,
‘मनोहारी, क्या तुमने उन्हें देखा है ?’
‘अरे बाप रे ! अगर राजे ने मुझे नहीं देखा होता, तो ये पैर कैसे दिखते ?’
‘नसीब तुम्हारा, घर में रहकर हमें दर्शन नहीं होते।’
‘वे अब आएंगे !’
‘यहां से आ रहे हैं, और वहां जा रहे हैं !’
‘अब जब राजे आ जाएँ, तो उन्हें जाने मत दीजिए। कहते हैं, पति को हमेशा अपनी मुट्ठी में रखना चाहिए।’
रानी सईबाई मुस्कुरा उठीं। राजे को अपनी मुट्ठी में रखने की कल्पना मात्र से ही उन्हें हँसी आ गई। वे बोलीं,
‘रख लिया होता, परंतु...’
‘परंतु क्या ?’
‘मुट्ठी ही बहुत छोटी है, देखो !’ रानी सईबाई खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
मां साहब की डांट और आरती की तैयारी
‘यह हँसी-मज़ाक किस बात का चल रहा है ?’ मां साहब के स्वर सुनाई दिए,
दोनों खड़े हो गए। रानी सईबाई ने कहा,
‘हम तैयार हैं।’
‘हाँ, वह तो दिखाई दे रहा है। परंतु आरती को कौन देखेगा ?’
दोनों जीभ काटकर बाहर भाग गईं।
विजयी शिवाजी महाराज का भव्य स्वागत
राजाओं का रोहिडेश्वर का पराक्रम पूरे वाड़े में फैला था। हर तरफ कानाफूसी हो रही थी। घोड़ों के खुरों की आवाज सुनाई देने लगी। और सबने अपना काम छोडकर दौड़ना शुरू कर दिया। घुड़सवार सेना वाड़े के सामने रुक गई। महल के बाहर का मैदान घोड़ों के खुरों से भर गया।
राजे घोड़े से नीचे उतरें। वाड़े के द्वार पर दासियों ने राजा के पैरों पर पानी डाला। दही-भात से आरती उतारी। राजे ने कदम उठाया। तभी उनकी दृष्टि पीले जरीदार वस्त्र धारण किए हुए रानी सईबाई पर पड़ी। कदम पुनः पीछे खींच लिया।
रानी सईबाई और शिवाजी महाराज का भावुक मिलन
रानी सईबाई आए। उन्होंंने राजे के सिर पर तिलक लगाने के लिए हाथ उठाया। राजे ने अपना सिर झुकाया। पसीने से भीगा माथा, नुकीली नाक, कानों में लटकती बालियाँ - पल भर में कितना मनमोहक दृश्य था!
रानी सईबाई शरमा गए। राजे की दृष्टि रानी सईबाई पर टिकी हुई थीं। रानी सईबाई ने संकोच में राजे के हाथ में पान का बीड़ा थमा दिया और आरती उतारी। बीड़ा थाल में रखते हुए राजे के होठों पर हल्की मुस्कान थी।
मां साहब का आशीर्वाद और मनोहारी का रहस्य
राजे अंदर आए। मां साहब के चरण स्पर्श किए और प्रणाम किया। मां साहब ने कहा,
‘आयुष्मान भव ! सदैव विजयी रहो !’
राजे की दृष्टि मां साहब के पास खड़ी मनोहारी पर पड़ी। वे रुक गए। मां साहब ने पूछा,
‘क्यों रुके, राजे ?’
मनोहरी की ओर इशारा करते हुए राजे ने कहा, ‘इसे कहीं देखा है।'
आगे की कहानी?
राजे की नज़र जैसे ही मनोहारी पर पड़ी, उनके कदम अचानक थम गए। चेहरे पर उभरती पहचान ने सबको हैरान कर दिया।
मनोहारी आखिर कौन थी? उसे देखकर शिवाजी महाराज के मन में कौन-सी पुरानी स्मृति जाग उठी?
उत्सव का माहौल पलभर में रहस्य में बदल गया। अब हर किसी की निगाह राजे के अगले शब्दों पर टिक गई।
क्या मनोहारी का अतीत रोहिडेश्वर विजय से जुड़ा है? इसका चौंकाने वाला रहस्य अगले अध्याय में सामने आएगा।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – रोहिडेश्वर विजय के बाद विजयी होकर लौटे युवा स्वराज्य-निर्माता। उनकी दूरदृष्टि, पराक्रम और सजगता हर घटना में दिखाई देती है।
- रानी सईबाई – शिवाजी महाराज की धर्मपत्नी, जिनका सरल स्वभाव, प्रेम और समर्पण इस भावुक मिलन को यादगार बना देता है।
- मां साहब जिजाबाई – स्वराज्य की प्रेरणा और शिवाजी महाराज की सबसे बड़ी मार्गदर्शक। उनका आशीर्वाद ही हर विजय का आधार है।
- मनोहारी – महल की सेविका, जिसे देखकर शिवाजी महाराज अचानक रुक जाते हैं। उसके व्यक्तित्व से कहानी में रहस्य और उत्सुकता बढ़ जाती है।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
रोहिडेश्वर किले की विजय स्वराज्य के प्रारंभिक इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। इस विजय ने यह सिद्ध कर दिया कि युवा शिवाजी महाराज केवल साहसी योद्धा ही नहीं, बल्कि कुशल रणनीतिकार भी थे। इस सफलता ने मावलों का आत्मविश्वास बढ़ाया और स्वराज्य की नींव को मजबूत किया। महल में हुआ स्वागत केवल एक विजेता का सम्मान नहीं था, बल्कि स्वराज्य के उज्ज्वल भविष्य का उत्सव भी था। मां साहब का आशीर्वाद, रानी सईबाई का स्नेह और प्रजा का विश्वास—इन तीनों ने मिलकर शिवाजी महाराज के संघर्ष को नई दिशा दी। यही विजय आगे चलकर मराठा साम्राज्य के विस्तार की प्रेरणा बनी।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह प्रसंग सिखाता है कि सच्ची विजय केवल युद्ध जीतने से नहीं, बल्कि अपने परिवार, गुरु और समाज का विश्वास जीतने से भी मिलती है।
- सफलता के बाद भी विनम्रता बनाए रखना, बड़ों का सम्मान करना और अपनों के प्रेम का आदर करना महान व्यक्तित्व की पहचान है।
- शिवाजी महाराज का प्रत्येक कदम यह संदेश देता है कि नेतृत्व केवल तलवार से नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदनशीलता और दूरदृष्टि से भी स्थापित होता है।
निष्कर्ष
रोहिडेश्वर विजय के बाद का यह प्रसंग वीरता, प्रेम, सम्मान और रहस्य का सुंदर संगम है। एक ओर विजेता शिवाजी महाराज का गौरवशाली स्वागत होता है, तो दूसरी ओर मनोहारी को देखकर उनका अचानक रुक जाना कहानी में नया मोड़ ला देता है। यही रहस्य पाठक को अगले अध्याय तक बांधे रखता है और श्रीमान योगी की कथा को और अधिक रोमांचक बना देता है।
विशेष संवाद
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