दादोजी कोंडदेव ने बगीचे का आम तोड़कर खुदको पापी और अपराधी क्यों कहा?
दादोजी कोंडदेव ने बगीचे का आम तोड़कर खुदको पापी और अपराधी क्यों कहा?
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| दादोजी कोंडदेव ने बगीचे का आम तोड़कर खुदको पापी और अपराधी क्यों कहा? |
दादोजी कोंडदेव अपनी वर्षों की मेहनत से तैयार हुई आम्रवाटिका को देखकर गर्व से भर उठे। हर वृक्ष उनकी तपस्या की कहानी कह रहा था।
उसी बाग में एक सुनहरा आम उनकी नज़र में आया। अनजाने में उन्होंने उसे तोड़ लिया, लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे का रंग बदल गया।
जो व्यक्ति पूरे प्रदेश के लिए आदर्श था, वह स्वयं को “पापी” और “अपराधी” कहकर धिक्कारने लगा। आखिर एक साधारण आम में ऐसा क्या छिपा था?
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की राजे ने अपनी भूल स्वीकार कर दादोजी से क्षमा तो माँग ली, लेकिन मन का तूफ़ान शांत नहीं हुआ। अपराधबोध ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया।
रात बीतती गई, पर शिवाजी महाराज ने भोजन नहीं किया। सईबाई ने मनाने की कोशिश की, मगर राजे का मौन और गहरा होता गया।
सुबह जब रानी जिजाबाई स्वयं उनके कक्ष में पहुँचीं, तो एक ऐसा सत्य सामने आया जिसने राजे के हृदय को भावुक कर दिया।
लेकिन रानी सईबाई ने ऐसा क्या कहा, जिसने राजे की होंठों पर मुस्कान ला दी? जानिए इस भावनात्मक कथा में।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१७-१
गर्मी के मौसम में खेडबारे की ओर प्रस्थान
गर्मी का मौसम आते ही लाल महल का निवास खेडबारे के वाड़े में स्थानांतरित कर दिया गया। राजे, रानी जिजाबाई और दादोजी के खेडबारे में आकर ठहरने से पूरा खेडबारा चहल-पहल और रौनक से भर उठा। वाड़े की ओर भीड़ बढ़ने लगी। शिवापुर में दादोजी द्वारा लगाए गए आम के बाग आकार ले चुके थे। राजे अक्सर दादोजी के साथ बगीचा देखने जाया करते थे।
होली की तैयारियां और रानी जिजाबाई की उदासी
फाल्गुन पूर्णिमा निकट आ रही थी। घर पर त्योहार की तैयारियां चल रही थीं। फाल्गुन पूर्णिमा की सुबह वाड़े के सामने होली चौक की सफाई की गई। सुंदर अरंडी का पेड़ बजाते गाते हुए लाया गया। उन्हें बताने के लिए राजे दौड़कर अंदर गए। भीतर के बरामदे में रानी सईबाई खड़ी थी। राजाओं ने पूछा,
‘माँ साहब कहा है ?’‘अपने महल में रो रहे हैं।’
‘क्या हुआ ?’
‘मैंने पूछा। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं बताया। कहा, जाओ खेलो।’
राजे माँ साहब के पास गए। राजे को देखते ही माँ साहब ने घबराकर अपनी आंखें पोंछ लीं। राजे पास गए, बैठे; और माँ साहब के गले लगते हुए उन्होंने पूछा,
‘माँ साहब, क्या हुआ ?’
उस एक वाक्य से रुके हुए आंसू बहने लगे। वह शिवाजी राजे को गले लगाकर रो रही थी। राजे ने बड़ी कठिनाई से उस आलिंगन से स्वयं को मुक्त किया। माँ साहब के आंसू पोंछते हुए उन्होंने कहा,
‘माँ साहब, आपको हमारी शपथ है।’
‘हाँ, राजे ! कहिए छूट गई।’
‘कहते हैं, परंतु बताइए कि आप रो क्यों रहे हैं ?’
‘बताते है। कहिए छूट गई।’
‘छूट गई।’
दादामहाराज की याद में बहते आँसू
माँ साहब ने आँखें पोंछीं। राजे को अपने पास लेते हुए उन्होंने कहा,
‘राजे, मुझे आपके दादामहाराज की याद आ गई।’
‘क्यों ?’
‘आज उनका जन्मदिन है। हम आपका जन्मदिन मनाते हैं, परंतु उनका जन्मदिन कौन मनाता होगा ?’
‘माँ साहब, फिर आप दादासाहब महाराज को क्यों नहीं बुलाते ?’
माँ साहब की आँखों में आँसू भर आए। उन्होंने आँसू रोकते हुए कहा,
‘यदि इतना हमारे वश में होता, तो शंभू हमसे दूर क्यों रहता ?’
माँ साहब शीघ्रता से उठे और बोले,
‘राजे ! चलिए। आज होली का दिन है। बहुत-से काम पड़े हैं।’
होली के बाद आम्रवाटिका का सौंदर्य
होली का उत्सव संपन्न हुआ और ग्रीष्म ऋतु अपने तपते कदमों के साथ धरती पर उतर आई। आम के बौरों से लदे वृक्षों ने भूमि पर अपनी शीतल छाया बिखेर दी थी। दिन-ब-दिन बढ़ते फलों के भार से आम की डालियाँ धरती की ओर झुकती जा रही थीं।
दोपहर के समय दादोजी शहापुर की आम्रवाटिका में टहल रहे थे। विशाल और घने आम के वृक्षों से पूरी बाग़ सुशोभित हो उठी थी। कहीं-कहीं शाखाओं पर इक्का-दुक्का आम भी लटकते दिखाई दे रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो पाँच-छह वर्षों के परिश्रम को सार्थकता मिल गई। हाल ही में जिन वृक्षों के चारों ओर सिंचाई के लिए मेड़ें बनाई गई थीं, उन्हें संतोष भरी दृष्टि से देखते हुए दादोजी आगे बढ़ रहे थे। उनके पीछे कृष्णाजीपंत चल रहे थे।
दादोजी के परिश्रम का फल
तभी दादोजी बोले,
‘कृष्णाजी, वृक्षों ने शीघ्र फल धारण कर लिए हैं।’
‘पंत, इसका श्रेय आपको। आपने शिवपुर, शाहपुर और जीजापुर में खूबसूरत बगीचे लगाए; आपने खुले मैदानों को स्वर्ग बना दिया।’
‘थोरले महाराजों को आम बहुत प्रिय हैं। जब महाराज यहाँ आएँगे, तब भले ही किसी और बात के लिए मेरी प्रशंसा न करें, पर इन बागों के लिए अवश्य मेरी पीठ थपथपाएँगे।’
‘पंत, धूप बहुत तेज़ हो गई है। और समय भी काफी हो चुका है।’
‘हाँ, सही कहते हो। अब लौट चलें।’
एक आम जिसने सब कुछ बदल दिया
पंत मुड़ गए। आम्रवाटिका के बाहर उनकी घोड़ी खड़ी थी। चलते-चलते अचानक उनके कदम ठिठक गए। एक सुंदर, राजसी आम पेड़ पर हाथ की पहुँच भर की ऊँचाई पर झूल रहा था। उसके ऊपर हल्की पीली आभा उभर आई थी।
अनजाने में ही पंत का हाथ ऊपर उठा और उन्होंने वह आम तोड़ लिया। उन्होंने आम को सूँघा। किंतु आम को देखते-देखते उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। उनका मुख गंभीर हो उठा। उनका शरीर काँपने लगा।
‘क्या हुआ, पंत ?’ कृष्णाजी ने कहा।
पंत ने गुस्से में आम फेंकते हुए कहा,
‘मैं कितना अनियंत्रित हूँ ! कितना पापी हूँ ! धिक्कार है मुझ पर...!’
दादोजी का रहस्यमय पश्चाताप
पंत कुछ बड़बड़ाते हुए तेज़-तेज़ कदमों से आगे बढ़ रहे थे। कृष्णाजीपंत को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है।
दादोजी ने कृष्णाजीपंत की ओर देखे बिना ही घोड़े पर सवारी की, एड़ लगाई और घोड़ा तेज़ी से दौड़ पड़ा। वाड़े तक पहुँचने के बाद भी पंत ने किसी से एक शब्द नहीं कहा। वे सीधे वाड़े के पीछे स्थित अपने निवास-स्थान की ओर चले गए।
आगे की कहानी?
दादोजी कोंडदेव का चेहरा क्रोध, पश्चाताप और पीड़ा से भर चुका था। एक साधारण-सा आम उनके लिए इतना बड़ा अपराध कैसे बन गया?
कृष्णाजीपंत स्तब्ध थे। जिस व्यक्ति को पूरे प्रदेश में न्याय और अनुशासन का प्रतीक माना जाता था, वह स्वयं को पापी क्यों कह रहे थे?
वाड़े में पहुँचने के बाद भी दादोजी ने किसी से एक शब्द नहीं कहा। उनके मन में उठ रहा तूफान हर क्षण और भी प्रचंड होता जा रहा था।
लेकिन अगले ही दिन दादोजी ने जो निर्णय लिया, उसने ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल कायम की, जिसे सुनकर स्वयं शिवाजी महाराज भी जीवनभर नहीं भूल पाए...
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – मराठा स्वराज्य के संस्थापक और राजमाता जिजाबाई के पुत्र। बचपन से ही साहस, न्याय और धर्मनिष्ठा के संस्कारों में पले-बढ़े। उनकी शिक्षा-दीक्षा में दादोजी कोंडदेव का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
- राजमाता जिजाबाई – छत्रपति शिवाजी महाराज की माता और स्वराज्य की प्रेरणाशक्ति। उन्होंने शिवाजी महाराज के मन में धर्म, नीति और राष्ट्रभक्ति के संस्कार रोपे। उनका व्यक्तित्व दृढ़ता और मातृत्व का अद्भुत संगम था।
- दादोजी कोंडदेव – शिवाजी महाराज के गुरु, मार्गदर्शक और प्रशासक। अनुशासन, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध। उन्होंने पुणे क्षेत्र के विकास और शिवाजी महाराज के प्रारंभिक शिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- कृष्णाजीपंत – दादोजी कोंडदेव के विश्वसनीय सहयोगी। वे अक्सर दादोजी के साथ प्रशासनिक और सामाजिक कार्यों में सहभागी रहते थे।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग केवल एक आम तोड़ने की घटना नहीं है, बल्कि मराठा इतिहास में आदर्श चरित्र और नैतिकता का जीवंत उदाहरण है। दादोजी कोंडदेव ने पुणे, शिवापुर, शाहपुर और जीजापुर जैसे क्षेत्रों में बाग-बगीचों का विकास किया और जनकल्याण के अनेक कार्य किए। जब उन्होंने अनजाने में एक आम तोड़ा, तब उन्हें यह अहसास हुआ कि वह फल उनका निजी नहीं, बल्कि स्वामी की संपत्ति है। यही विचार उनके अंतर्मन को झकझोर गया। यह घटना दर्शाती है कि उस युग के आदर्श प्रशासक सार्वजनिक संपत्ति को कितनी पवित्र दृष्टि से देखते थे। शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व में जो न्यायप्रियता, अनुशासन और उत्तरदायित्व दिखाई देता है, उसकी जड़ें ऐसे ही प्रेरणादायक प्रसंगों में निहित हैं। यह कथा मराठा शासन की उच्च नैतिक परंपराओं का प्रतीक मानी जाती है।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा चरित्र वही है जो अकेले में भी सही और गलत का भेद समझे।
- दादोजी कोंडदेव के पास अधिकार था, सम्मान था और किसी ने उन्हें आम तोड़ते हुए रोका भी नहीं, फिर भी उन्होंने स्वयं को दोषी माना।
- यह घटना बताती है कि ईमानदारी केवल दूसरों को दिखाने की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज होती है।
- सार्वजनिक या किसी अन्य की संपत्ति का सम्मान करना, अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहना और छोटी-सी गलती को भी गंभीरता से लेना ही महान व्यक्तित्व की पहचान है।
- यही संस्कार आगे चलकर महान नेतृत्व का आधार बनते हैं।
निष्कर्ष
दादोजी कोंडदेव का यह प्रसंग मराठा इतिहास की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में से एक माना जाता है। एक साधारण आम के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि महानता शक्ति या पद से नहीं, बल्कि चरित्र और सिद्धांतों से प्राप्त होती है। यही कारण है कि उनके आदर्श आज भी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिक नेतृत्व के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में याद किए जाते हैं। यह कथा हर युग में मनुष्य को अपने कर्तव्य और चरित्र के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है।
विशेष संवाद
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