उजड़े पुणे में पहला कदम… बाल शिवाजी का सपना जागा

उजड़े पुणे में पहला कदम… बाल शिवाजी का सपना जागा

उजड़े पुणे में पहला कदम… बाल शिवाजी का सपना जागा
उजड़े पुणे में पहला कदम… बाल शिवाजी का सपना जागा

खंडहरों में बदल चुके पुणे में जब शिवाजी राजे ने कदम रखा, तो हर ओर वीरानी और डर पसरा था। लेकिन उनकी माँ जिजाबाई की आँखों में कुछ और ही सपना था—एक नए भविष्य का।

टूटे पत्थरों के बीच अचानक एक चमत्कार होता है, जो इस उजड़े शहर की किस्मत बदलने का संकेत देता है।

दादोजी कोंडदेव की योजना और शिवबा के जोश से धीरे-धीरे बसावट शुरू होती है। पर क्या यह सपना सच में सुरक्षित है? कौन सी चुनौतियाँ छिपी हैं इस नई शुरुआत के पीछे? लेकिन अचानक मिट्टी के नीचे मिला एक ऐसा संकेत… जिसने बदल दी इतिहास की दिशा!

क्या था वो रहस्य… और कैसे जन्म लेता है वही ऐतिहासिक लाल महल, और कैसे बना वहीं से लाल महल? जो आगे चलकर इतिहास बदल देता है…?


पिछले लेख में?

पिछले लेख में हमने पढ़ा की बीजापुर से आया एक साधारण सा संदेश…

लेकिन रानी जिजाबाई के हाथों में आते ही वह इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ बन गया!

क्या था उस संदेश में ऐसा, जिसने बाल शिवाजी के भविष्य की दिशा ही बदल दी?

बीजापुर की पूरी कहानी पिछे जरूर पढ़ें. . .



लेख का विस्तृत सारांश

९-१

उजड़े पुणे में शिवाजी राजे का प्रवेश

दोपहर ढलने के बाद शिवाजी राजे ने खंडहर हुए पुणे में प्रवेश किया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी प्राचीन शहर में प्रवेश कर रहे हों। दुर्ग की ढह चुकी बुर्जें एक समय के वैभव की कहानी कह रही थीं। जगह-जगह ढही हुई इमारतें दिखाई दे रही थीं। उन पर घनेरी की झाड़ियाँ उग आई थीं। उनकी लाल-पीली फूलें जीवन की याद दिला रही थीं। हवेली के उजड़े हुए अवशेष एक समय की शान की निशानी थे।

डरे हुए लोग और पहली बातचीत

गाँव की नदी किनारे झोपड़ियों में बसे लोग जरूरी और उपयोगी समान के साथ आए हुए लोगों से भयभीत हो गए थे। दूर से वे डर भरी नजरों से यात्रियों के समूह को देख रहे थे। एक खाली जगह पर पहुँचते ही पंत ने हाथ उठाकर इशारा किया। यात्रियों का समूह रुक गया। पालकी से रानी जिजाबाई उतरीं। दासियाँ इकट्ठा हो गईं। बैलों से सामान उतारा जाने लगा। शिवाजी राजे आसपास की उजड़ी, भग्न इमारतों को देख रहे थे। उन्होंने पूछा,

'माँ साहब, यही पुणे है ?'

'हाँ !'

'यहाँ तो हमारे सिवा कोई नहीं दिखता।'

'बुलाया, तो सब आ जाएंगे।'

'रहना कहाँ है ? कहाँ है वाड़ा ?'

'वाड़ा देखकर नहीं रहते, राजे ! बड़े लोग वाड़े बनाकर रहते हैं।'

नई शुरुआत और पहला दीपक

शामियाना लगाया गया। चारों ओर झोपड़ियाँ बन गईं। मूलामुठे के संगम का पानी डूबते सूरज की किरणों में चमक रहा था। जागीर के वारिस ने उजड़ी हुई इमारत पर पहला दीपक जलाया था।

दादोजी कोंडदेव के सामने भविष्य का पुणे दिख रहा था। दादोजी के साथ शिवाजी राजे घूम रहे थे। डरे हुए लोग इकट्ठा हो गए थे।

गणेश जी की खोज

एक दिन शिवबा दौड़ता हुआ आया।

'माँ साहब, पंत को देवता मिल गया।'

'कहाँ ?'

'नदी के पास।'

जीजामाता उठीं। दासियों के साथ रानी जिजाबाई जा रही थीं। शिवबा रास्ता दिखा रहा था। रानी जिजाबाई को आते देख सब अदब से खड़े हो गए; किनारे हो गए। पंत के चेहरे पर खुशी थी। ईंटों के ढेर के नीचे छिपा गणेश बाहर आ गया था। मूर्ति सुंदर थी; अखंड थी। रानी जिजाबाई ने हाथ जोड़ लिए। पंत बोले,

'माँ साहब ! शुरुआत तो अच्छी हुई।'

'हाँ, पंत, इसी जगह पर सुंदर मंदिर बनाओ।'

पंत ने सहमति दी और कहा, ‘लेकिन, मासाहेब, अभी वाड़े की जगह तय नहीं हो रही है।’

‘वाड़े की जगह मंदिर के पास ही होनी चाहिए।’

लाल महल की नींव

वाड़े की योजना बनाई गई। भूमि पूजन के बाद दादोजी कोंडदेव ने वाड़े की जगह पर पहली कुदाल चलाई। दौलत के मालिक के लिए एक ही वाड़ा होना दादोजी को स्वीकार नहीं था। सुरक्षा की दृष्टि से भी यह उचित नहीं था। उन्होंने खेडबारे खोर को दूसरी बस्ती के लिए चुना। वाड़े के लिए जगह चुनी। गाँव की सीमा निर्धारित की... और खेडबारे में दूसरे वाड़े का निर्माण शुरू हुआ। परगना के हवलदार के रूप में बापूजी मुद्गल नन्हेकर को नियुक्त किया गया।

बरसात का मौसम आया। तब पंत को शिवाजी राजे और रानी जिजाबाई के निवास की चिंता हुई। नन्हेकर ने यह चिंता दूर की। उनका खेडबारे में वाड़ा था; उन्होंने वह दे दिया। शिवबा रानी जिजाबाई के साथ खेडबारे में रहने लगे। पंत के साथ पुणे-खेडबारे की यात्राएं होती रहती थीं। नए उठने वाले वाड़े, बनने वाली बस्तियों को वह देखते थे। शास्त्रीबुवा के पास सुबह-शाम पढ़ाई करते थे। समय मिलने पर माँ को रामायण-महाभारत पढ़कर सुनाते थे।

पुणे का पुनर्निर्माण

वाड़े बनाए जा रहे थे। कुएं पानी की तलाश में खुदाई जा रहे थे। पुणे-खेडबारे में सैकड़ों लोग इस काम में लगे थे। मुल्क के राजमिस्त्री, बढ़ई, बारह बलुतेदार यह खबर सुनकर पुणे-खेडबारे की ओर दौड़ रहे थे। काम के जरूरतमंद लोग आ रहे थे।

लाल महल का निर्माण

खेड और पुणे के वाड़े तैयार हो गए। कुओं में पर्याप्त पानी मिला। खेड की तुलना में पुणे का वाड़ा ऊंचा और सुंदर था। दो विशाल आंगनों के साथ दीवानखाना था। खास दीवानखाना था। रानीवास के महल थे। कोठी, रसोईघर थे। सुंदर देवघर था। इसके अलावा अस्तबल, गोशाला थी, जो अलग थी। वाड़े की इमारत के साथ-साथ गाँव की इमारतें भी बनाई जा रही थीं। दादोजी ने पुणे के वाड़े का नाम ‘लाल महल’ रखा। लाल महल के पास ही ‘श्रीगजानन मंदिर’ था।

शिवाजी राजे पुणे के वाड़े में आए। दादोजी ने फड़ के चुनिंदा लोगों को इकट्ठा किया। अस्तबल सजाया गया। लेकिन गाँव के वतनदार, हकदार बाहर ही थे। दादोजी ने उन्हें बुलावा भेजा।

उजड़े पुणे में पहला कदम… बाल शिवाजी का सपना जागा
उजड़े पुणे में पहला कदम… बाल शिवाजी का सपना जागा

प्रमुख पात्र और उनका परिचय

  • रानी जिजाबाई – शिवाजी राजे की माता, जिन्होंने उनमें संस्कार और स्वराज्य का बीज बोया।
  • दादोजी कोंडदेव – शिवाजी राजे के मार्गदर्शक और प्रशासक, जिन्होंने पुणे के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभाई।
  • शिवाजी महाराज – मराठा साम्राज्य के संस्थापक, दूरदर्शी और साहसी नेता।

लेख का ऐतिहासिक महत्व

यह घटना पुणे के पुनर्जागरण की शुरुआत थी। यहीं से लाल महल बना, जिसने आगे चलकर मराठा साम्राज्य की नींव मजबूत की।

इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • उजड़ी हुई जगह को भी मेहनत से स्वर्ग बनाया जा सकता है।
  • सच्चा नेता वही है जो शून्य से शुरुआत करता है।
  • आस्था और परिश्रम मिलकर चमत्कार करते हैं।

निष्कर्ष

उजड़े हुए पुणे में शिवाजी महाराज का प्रवेश केवल एक शुरुआत नहीं था, बल्कि एक नए युग का जन्म था।


विशेष संवाद


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न : लाल महल किसने बनवाया?

उत्तर : दादोजी कोंडदेव ने रानी जिजाबाई और शिवाजी राजे के लिए बनवाया।

प्रश्न : पुणे का पुनर्निर्माण कब शुरू हुआ?

उत्तर : शिवाजी महाराज के बचपन में दादोजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में।


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