उजड़ा पुणे… फिर शिवाजी राजे ने जो किया, सब दंग रह गए!
उजड़ा पुणे… फिर शिवाजी राजे ने जो किया, सब दंग रह गए!
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| उजड़ा पुणे… फिर शिवाजी राजे ने जो किया, सब दंग रह गए! |
उजड़ा हुआ पुणे… डर से कांपते लोग… और हर किसी के मन में एक ही सवाल—क्या यह शहर फिर कभी बस पाएगा? जब दादोजी ने बसने का प्रस्ताव रखा, तो लोगों के दिलों में छिपा डर सामने आ गया। कोई आगे बढ़ने को तैयार नहीं था। तभी एक बालक आगे आया… शिवाजी राजे!
लेकिन असली चौंकाने वाला पल तब आया, जब देवी के चौक में एक अनोखा निर्णय लिया गया—सोने के हल से उस उजड़ी भूमि को जोतने का! क्या यह केवल एक धार्मिक परंपरा थी या एक क्रांतिकारी शुरुआत?
और फिर… कुछ ऐसा हुआ जिसने लोगों के डर को तोड़ दिया और इतिहास बदल गया।
आखिर उस दिन क्या हुआ था जिसने पुणे को फिर से जीवित कर दिया? पूरी कहानी जानकर आप हैरान रह जाएंगे…
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की खंडहरों में बदल चुके पुणे में जब शिवाजी राजे ने कदम रखा, तो हर ओर वीरानी और डर पसरा था। लेकिन उनकी माँ जिजाबाई की आँखों में कुछ और ही सपना था—एक नए भविष्य का।
टूटे पत्थरों के बीच अचानक एक चमत्कार होता है, जो इस उजड़े शहर की किस्मत बदलने का संकेत देता है।
दादोजी कोंडदेव की योजना और शिवबा के जोश से धीरे-धीरे बसावट शुरू होती है। पर क्या यह सपना सच में सुरक्षित है? कौन सी चुनौतियाँ छिपी हैं इस नई शुरुआत के पीछे? लेकिन अचानक मिट्टी के नीचे मिला एक ऐसा संकेत… जिसने बदल दी इतिहास की दिशा!
क्या था वो रहस्य… और कैसे जन्म लेता है वही ऐतिहासिक लाल महल, और कैसे बना वहीं से लाल महल? जो आगे चलकर इतिहास बदल देता है…?
पूरी कहानी पिछे पढ़ें. . .
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
९-२
पुणे बसाने का प्रस्ताव और लोगों का डर
सभी लोग इकट्ठा हो गए। पुणे में बसने का प्रस्ताव दादोजी ने रखा। एक पाटील बोले,
'पंत, आप कहते हैं ! लेकिन कितनी बार गांव बसाना और उजाड़ना ? हमें वतन नहीं चाहिए क्या ? लेकिन किस भरोसे पर गांव बसाएं ?'
'हमने नहीं बसाया ?' कक्ष की बैठक में बैठे शिवाजी राजे बोले।
'आपके पास जनशक्ति है, मालिक !'
पंत बोले, 'मराठा कभी हार मानकर नहीं बैठा, ऐसा मैंने देखा है। पाटील, सच बताओ...'
'बोलूं क्या ?' पाटील अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए बोले, 'हां, वहां सुख नहीं है, पंत। गांव मिला, तो सबको चाहिए। लेकिन मन डरता है...'
'किससे ?'
'देवी के चौक पर पार मारा नहीं था ? घर उठाने की हिम्मत कौन करेगा ?'
पंत सोच में पड़ गए। उन्होंने सभी को विदा किया।
सोने के हल से नई शुरुआत
चार दिन पंत व्यस्त रहे। एक दिन उन्होंने सभी को फिर बुलाया। सैकड़ों लोग इकट्ठा हुए। वाड़े के दरवाजे पर बाजे वाले थे। जिजाऊ ने देवघर में सोने का हल पूजा। देवता के चरणों में प्रणाम कर हल उठाया गया।
हल के साथ पंत और शिवबा चल रहे थे। जरी की टोपी, अंगरखा, पैरों में चप्पल, कमर में छोटी तलवार और पीठ पर ढाल लगाए बालराजे की मूर्ति सभी कौतुक से देख रहे थे।
वाड़े के बाहर सुंदर बैल जोड़ी खड़ी थी। उनकी पीठ पर कलाबत्तू की झूलें थीं। हल वाड़े के बाहर आया। देखने वालों में वतनदार, पाटील, किसान और बारह बलुतेदार थे।
हल के साथ जनसमूह देवी के चौक में धूमधाम से पहुंचा। चौक में बड़ी पहार नजर आ रही थी। पंत ने कुदाल उठाई तो पाटील आगे आए। उन्होंने पहार को ढीला किया। पंत ने सभी पर नजर डाली और ‘हर हर महादेव’ कहते हुए पहार को उठाया। सैकड़ों मुखों से ‘हर हर महादेव’ का गजर उठ गया।
सोने का हल जोड़ा गया; और शिवाजी राजे के हाथों पुणे की उजड़ी हुई इमारत को जोता गया। सोने का फाल जमीन से लगा।
पुणे में जीवन की वापसी
दूसरे दिन से निश्चिंत मन से गांव बसने लगा। उजड़े खेतों पर हल चलने लगे। दिन बारिश के थे।
शिवापुर में नई योजना
एक दिन पंत जिजाऊ से बोले,
'मां साहब, आज राजे को लेकर शिवापुर चलकर आते हैं।'
'क्यों ?'
'शिवापुर में वाड़े के पास आम का बाग लगाने का तय हुआ है। राजे के हाथों से बाग लगवाते हैं। कल रात ही पौधे आने की खबर आई थी। इसलिए सूचित नहीं कर सके।'
राजघराने की हल्की नोकझोंक
'सारी बातें कहां बताते हो हमें ?'
चमककर दादोजी ने पूछा, 'ऐसा कब हुआ है ? कौन सी बात छुपाई है मैंने ?'
जिजाबाई हंसकर बोलीं, 'स्वामी ने छोटी रानीसाहेब को लाने की खबर कहां दी थी ?'
'किसने बताया आपको ?'
'समझ में आया ना? शिवनेरी पर ही लक्ष्मीबाई ने हमें बताया। इतना ही नहीं, तुकाबाई रानीसाहेब को बेटा होने की भी खबर हमें मिली है।'
'गड़बड़ी में रह गया सच...' दादोजी बड़बड़ाए।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- शिवाजी राजे – मराठा साम्राज्य के संस्थापक, बचपन से ही नेतृत्व और साहस के प्रतीक।
- रानी जिजाबाई – शिवाजी राजे की माता, जिन्होंने उनमें धर्म और स्वराज्य की भावना जागृत की।
- दादोजी कोंडदेव – शिवाजी राजे के गुरु और मार्गदर्शक, जिन्होंने पुणे को बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह घटना पुणे के पुनर्निर्माण और मराठा शक्ति के उदय का प्रारंभिक संकेत थी। सोने के हल से भूमि जोतना केवल धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि आत्मविश्वास और पुनर्जागरण का प्रतीक था।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- डर और अंधविश्वास को तोड़कर ही नई शुरुआत होती है।
- सही नेतृत्व लोगों में साहस और विश्वास पैदा करता है।
निष्कर्ष
शिवाजी राजे और दादोजी कोंडदेव के इस प्रयास ने यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ निश्चय और साहस से किसी भी उजड़े हुए स्थान को फिर से जीवित किया जा सकता है।

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