रानी जिजाबाई को मिला संदेश… क्या बदलने वाला था बाल शिवाजी का भाग्य?

रानी जिजाबाई को मिला संदेश… क्या बदलने वाला था बाल शिवाजी का भाग्य?

रानी जिजाबाई को मिला संदेश… क्या बदलने वाला था बाल शिवाजी का भाग्य?
रानी जिजाबाई को मिला संदेश… क्या बदलने वाला था बाल शिवाजी का भाग्य?

बीजापुर से आया एक साधारण सा संदेश…

लेकिन रानी जिजाबाई के हाथों में आते ही वह इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ बन गया!

क्या था उस संदेश में ऐसा, जिसने बाल शिवाजी के भविष्य की दिशा ही बदल दी?

पूरी कहानी जरूर पढ़ें…


पिछले लेख में?

पिछले लेख में हमने पढ़ा की भयंकर दुष्काल… भूख से तड़पता जनजीवन… और उसी बीच मुगलों का हमला!

जब सब कुछ खत्म होता दिख रहा था, तब रानी जिजाबाई ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने पूरी सूखी धरती को फिर से जीवित कर दिया…

और वहीं से शुरू हुआ बाल शिवाजी के महान भविष्य का बीज…

फिर क्या हुआ? पिछे पढ़ें. . .



लेख का विस्तृत सारांश

८-२

उमाबाई का विदा होना

रानी जिजाबाई संतोषपूर्वक मुस्कुराईं।

जैसे ही क्षेत्र थोड़ा स्थिर हुआ, उमाबाई जाने लगीं। उन्होंने रानी जिजाबाई को साथ चलने का बहुत आग्रह किया; लेकिन रानी जिजाबाई तैयार नहीं हुईं। उन्होंने कहा,

‘सासूजी ! क्या मुझे यहां रहने की रुची है ? लेकिन महाराज का आदेश मिले बिना मैं कैसे जा सकती हूं ?’

उमाबाई ने कुछ नहीं कहा। रानी जिजाबाई-बाल शिवाजी राजे को आशीर्वाद दिया और एक दिन वे वेरूळ के लिए निकल गईं।

शहाजी महाराज का संघर्ष और राजनीति

एक साल बाद रानी जिजाबाई फिर से दुर्ग पर आईं। शहाजी महाराज ने मुगलों की नौकरी छोड़कर निजामशाही को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। मुगलों ने दौलताबाद पर कब्जा कर लिया, फिर भी शहाजी महाराज निराश नहीं हुए। उन्होंने नए शाह को माहुली में रखा। बीजापुर और मुगल एक हो गए। इन दो विशाल शक्तियों से मुकाबला करना आसान नहीं था। निजामशाही का पतन हो गया। शहाजी महाराज ने खुद की सेना बनाई और मुगलों का सामना किया। एक जागीरदार द्वारा नया विद्रोह खड़ा कर मुगल सत्ता का सामना करने का यह एक दुर्लभ उदाहरण था। दो वर्षों में प्रबल मुगल सत्ता ने शहाजी महाराज के विद्रोह को कुचल दिया; और मजबूरन शहाजी महाराज ने बीजापुर की नौकरी स्वीकार कर ली। इस प्रक्रिया में छह साल बीत गए। छह वर्षों के लंबे समय के बाद शहाजी महाराज को शांति और स्थिरता प्राप्त हुई।

शिवनेरी में बाल शिवाजी का बचपन

इस बीच बाल शिवाजी राजे शिवनेरी में बड़े हो रहे थे; घोड़े पर सवारी कर रहे थे। लेण्याद्री और आसपास का इलाका उनकी नजरों के सामने था। शास्त्री जी ने उन्हें अक्षरों की पहचान कराई थी।

पुणे की जागीर का संदेश

सात साल बीत गए; और बीजापुर से एक संदेश आया। संदेश के साथ घुड़सवार थे। शाही सामान थे; काबाड़ी के बैल थे।

रानी जिजाबाई ने संदेश खोला। शहाजी महाराज को पुणे की जागीर मिली थी। उनका अत्यंत विश्वासपात्र, चौकस और बुद्धिमान व्यक्ति दादोजी कोंडदेव उनके साथ भेजा गया था। दादोजी के साथ पुणे जाने का आदेश था।

रानी जिजाबाई ने दादोजी को बुलावा भेजा। दादोजी ने कक्ष में आकर प्रणाम किया।

दादोजी कोंडदेव से मुलाकात

अभी-अभी वृद्धावस्था की ओर झुके हुए गौरवर्ण के दादोजी खड़े थे। सिर पर पगड़ी, शरीर पर अंगरखा और पैरों में महीन धोती थी। चौड़ा माथा और तीक्ष्ण दृष्टि उनके रौब को बढ़ा रही थी। रानी जिजाबाई ने झुककर नमस्कार किया। उन्होंने शिवाजी राजे से कहा,

‘राजे, दादोजी को प्रणाम करो।’

शिवाजी राजे ने प्रणाम किया। दादोजी बोले,

‘रानी साहब, हमें प्रणाम करना चाहिए; राजे को नहीं।’

‘आप और दूसरों में फर्क है। हमें यह क्यों नहीं समझ आता ? हमारी जिम्मेदारी उठाने के लिए जिन्हें यहां भेजा गया, वे क्या कम विश्वास के होंगे ?’

‘रानी साहब, कब निकलना है ?’

‘आप कहें, तब ! अभी सवारी कहां है ?’

‘महाराज कर्नाटक के अभियान में व्यस्त हैं। वे खाली होते, तो वे ही आते।’

‘आखिरकार जिन्होंने हमारी जागीर जलाई, उन्हीं के अधीन नौकरी करनी पड़ी !’

‘रानी साहब, राजनीति एकतरफा नहीं होती। यह बहुपक्षीय होती है। राजनीति समय के साथ बदलती रहती है। जिस मुरार जगदेव ने पुणे जलाया, उसी मुरार जगदेव के साथ महाराज की इतनी मित्रता बढ़ गई कि नांगरगांव में महाराज जगदेव की तुला शहाजी महाराज की देखरेख में संपन्न हुई। नांगरगांव का नाम ‘तुलापुर’ हो गया। राजनीति के फिर से दांव पलटे। पासे उलटे पड़े और मुरार जगदेव आदिलशाह की नाराजगी का शिकार हो गए। उनका अत्यंत क्रूरता से वध हुआ।’

‘और महाराज ?’

महाराज का आदिलशाही में जितना वजन है, उतना किसी का नहीं है। महाराज को बारह हजार की मनसब है; ‘राजा’ यह किताबत है। पुणे-सुपा की जागीर उनके पास ही है। ऐश्वर्यसंपन्न, अधिकारसंपन्न, महाराज बंगलौर में सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं; अपने पराक्रम से आज कर्नाटक को गूंजा रहे हैं।

शिवनेरी दुर्ग से विदाई

दो दिनों में रानी जिजाबाई की तैयारी हो गई। छह वर्षों के परिचय में दुर्ग पर का हर व्यक्ति घर का बन गया था। विश्वासराव, लक्ष्मीबाई जैसे लोगों को छोड़ते समय दिल में दर्द हो रहा था। दुर्ग के सभी लोगों को रानी जिजाबाई ने शिवाजी राजे के हाथों से दान दिया। शुभ मुहूर्त पर लक्ष्मीबाई ने रानी जिजाबाई की ओटी भरी। भरे मन से रानी जिजाबाई ने शिवाजी राजे के साथ शिवाई का दर्शन किया; और विश्वासराव-लक्ष्मीबाई ने उन्हें विदा दी।

रानी जिजाबाई को मिला संदेश… क्या बदलने वाला था बाल शिवाजी का भाग्य?
रानी जिजाबाई को मिला संदेश… क्या बदलने वाला था बाल शिवाजी का भाग्य?

प्रमुख पात्र और उनका परिचय

  • रानी जिजाबाई – छत्रपति शिवाजी महाराज की माता, दृढ़ निश्चयी, धार्मिक और दूरदर्शी व्यक्तित्व जिन्होंने शिवाजी राजे के संस्कारों की नींव रखी।
  • बाल शिवाजी राजे – भविष्य के छत्रपति शिवाजी महाराज, जो इस प्रसंग में बाल्यावस्था में शिक्षा और युद्धकौशल का प्रारंभिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
  • शहाजी महाराज – शिवाजी राजे के पिता, पराक्रमी सेनानायक और दक्कन की राजनीति के प्रमुख रणनीतिकार।
  • उमाबाई – परिवार की ज्येष्ठ महिला (सासूजी), जिन्होंने रानी जिजाबाई को साथ चलने का आग्रह किया।
  • दादोजी कोंडदेव – शहाजी महाराज के विश्वासपात्र प्रशासक, जिन्हें पुणे जागीर की व्यवस्था संभालने हेतु भेजा गया।
  • मुरार जगदेव – आदिलशाही से संबंधित सरदार, जिनका नाम उस समय की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में आता है।
  • आदिलशाह – बीजापुर सल्तनत का शासक, जिसके अधीन शहाजी महाराज ने बाद में सेवा स्वीकार की।
  • विश्वासराव – दुर्ग से जुड़े विश्वसनीय व्यक्ति, जिन्होंने रानी जिजाबाई और शिवाजी राजे को विदाई दी।
  • लक्ष्मीबाई – दुर्ग की सम्मानित महिला, जिन्होंने शुभ मुहूर्त पर रानी जिजाबाई की ओटी भरी।
  • शास्त्री जी – बाल शिवाजी राजे को अक्षरज्ञान और प्रारंभिक शिक्षा देने वाले गुरु।

लेख का ऐतिहासिक महत्व

निजामशाही का पतन और संघर्ष

शहाजी महाराज ने मुगलों के विरुद्ध निजामशाही को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, लेकिन अंततः उन्हें आदिलशाह की सेवा स्वीकार करनी पड़ी। यह उस समय की जटिल दक्कनी राजनीति को दर्शाता है।

पुणे जागीर की शुरुआत

शहाजी महाराज को पुणे-सुपा की जागीर मिली और उनके विश्वसनीय प्रशासक दादोजी कोंडदेव को रानी जिजाबाई और बाल शिवाजी राजे के साथ पुणे भेजा गया। यही आगे चलकर स्वराज्य की आधारभूमि बनी।

राजनीतिक यथार्थवाद

मुगल, बीजापुर और अन्य शक्तियों के बीच बदलते गठबंधन यह दिखाते हैं कि उस समय राजनीति बहुपक्षीय और अवसरवादी थी।

शिवाजी राजे के व्यक्तित्व निर्माण की दिशा

शिवनेरी में शिक्षा, घुड़सवारी और संस्कार - इन सबने शिवाजी राजे के भविष्य के नेतृत्व की नींव रखी।

इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • धैर्य और संयम कठिन परिस्थितियों में सबसे बड़ी शक्ति होते हैं।
  • राजनीति समय के साथ बदलती रहती है, इसलिए परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना आवश्यक होता है।
  • माता जिजाबाई जैसे आदर्श व्यक्तित्व से बच्चों को महान संस्कार मिलते हैं।
  • संघर्ष और धैर्य ही महान नेतृत्व की नींव बनाते हैं।

निष्कर्ष

यह कालखंड शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण का आधार बना। राजनीतिक संघर्ष, बदलते गठबंधन और प्रशासनिक अनुभवों ने भविष्य के स्वराज्य की नींव रखी। पुणे जागीर से ही स्वतंत्र मराठा राज्य की अवधारणा ने आकार लेना प्रारंभ किया।


विशेष संवाद


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न : रानी जिजाबाई ने बाल शिवाजी राजे के संस्कार कैसे विकसित किए?

उत्तर : रानी जिजाबाई ने धार्मिक कथाओं, रामायण-महाभारत के प्रसंगों और वीरता की कहानियों के माध्यम से शिवाजी राजे के मन में स्वराज्य और धर्म रक्षा की भावना जागृत की।

प्रश्न : दादोजी कोंडदेव की भूमिका क्या थी?

उत्तर : दादोजी कोंडदेव को पुणे जागीर का प्रशासन संभालने और बाल शिवाजी राजे को युद्धकौशल तथा राज्य प्रबंधन की शिक्षा देने की जिम्मेदारी दी गई थी।

प्रश्न : शहाजी महाराज ने आदिलशाह की सेवा क्यों स्वीकार की?

उत्तर : उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण शहाजी महाराज ने रणनीतिक रूप से आदिलशाही की सेवा स्वीकार की, जिससे अपनी शक्ति और प्रभाव बनाए रखा जा सके।

प्रश्न : बाल शिवाजी राजे की प्रारंभिक शिक्षा कहाँ और कैसे हुई?

उत्तर : बाल शिवाजी राजे की प्रारंभिक शिक्षा दुर्ग में शास्त्री जी के मार्गदर्शन में हुई, जहाँ उन्हें अक्षरज्ञान के साथ-साथ नैतिक और सैन्य प्रशिक्षण भी दिया गया।

प्रश्न : इस प्रसंग का स्वराज्य की स्थापना से क्या संबंध है?

उत्तर : यह प्रसंग शिवाजी राजे के बाल्यकाल के संस्कारों और प्रशिक्षण को दर्शाता है, जो आगे चलकर स्वराज्य की स्थापना की नींव बने।


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