छत्रपति शिवाजी महाराज के बचपन में आया भयंकर दुष्काल… फिर क्या हुआ?
छत्रपति शिवाजी महाराज के बचपन में आया भयंकर दुष्काल… फिर क्या हुआ?
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| छत्रपति शिवाजी महाराज के बचपन में आया भयंकर दुष्काल… फिर क्या हुआ? |
दक्षिण की धरती मौत जैसी खामोशी में डूब चुकी थी।
गांव उजड़ रहे थे, लोग मुट्ठीभर अनाज के लिए अपनी इंसानियत तक खो रहे थे।
आकाश में केवल गिद्ध मंडरा रहे थे और धरती पर भूख का राज था। उसी भयावह समय में शिवनेरी दुर्ग के भीतर एक नन्हा बालक सब कुछ अपनी मासूम आँखों से देख रहा था—बाल शिवाजी।
दुर्ग के दरवाजे बंद थे, पानी आधा बचा था और हर व्यक्ति आने वाले विनाश से कांप रहा था।
फिर एक दिन अचानक आकाश में काले बादल छा गए।
बिजली चमकी… गर्जना हुई… और बाल शिवाजी ने अपनी माँ से पूछा—“वर्षा आई?”
उस एक वर्षा ने केवल सूखी धरती ही नहीं बदली, बल्कि एक ऐसे भविष्य को जन्म दिया जिसने किसानों के दर्द को अपनी आत्मा में बसाया। जब सभी लोग केवल जीवित रहने की सोच रहे थे, तब रानी जिजाबाई और बाल शिवाजी उजड़े गांवों को फिर से बसाने निकल पड़े।
लेकिन आखिर उस छोटे बालक ने ऐसा क्या देखा, जिसने उसे आगे चलकर प्रजा का सच्चा रक्षक बना दिया?
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की दुर्ग की शांत दीवारों के बीच सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन नियति एक नया तूफ़ान लेकर आने वाली थी।
शहाजी महाराज कुछ दिनों बाद पहली बार अपने परिवार के साथ सुकून के पल बिता रहे थे।
बाल छत्रपति शिवाजी महाराज की मासूम हँसी पूरे दुर्ग में गूंज रही थी, और रानी जिजाबाई की आँखों में वर्षों बाद संतोष दिखाई दे रहा था।
लेकिन अचानक आया एक मुगल संदेश सब कुछ बदल देता है।
संदेश पढ़ते ही शहाजी महाराज का चेहरा कठोर हो जाता है और उनकी आवाज़ में छिपी बेचैनी पूरे वातावरण को भय से भर देती है।
आखिर उस संदेश में ऐसा क्या था, जिसने आराम के उन पलों को खत्म कर दिया? क्यों शहाजी महाराज को तुरंत बरहानपुर के लिए निकलना पड़ा?
विदाई के उस क्षण में एक पिता अपने छोटे बेटे को चूमकर चला जाता है, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह बिछड़ना आने वाले इतिहास को किस दिशा में मोड़ देगा।
यही वह पल था, जहाँ से स्वराज्य की कहानी और भी रहस्यमयी बन जाती है।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
८-१
भयंकर दुष्काल की शुरुआत
बाल शिवाजी एक वर्ष का हुआ, तब क्षेत्र में भयंकर दुष्काल पड़ा।
गांव निर्जन हो रहे थे। पशुओं को छोड़ दिया गया था क्योंकि उन्हें भोजन देना असंभव हो गया था, और वे अनुपजाऊ भूमि में भटक रहे थे। गांव छोड़कर जा रहे लोगों का समूह देश छोड़कर जा रहे थे। अनाज ही संपत्ति बन गया था। सोने की कोई कीमत नहीं थी। जहां भी जाओ, भूखे लोग मार्ग रोककर बैठे रहते थे। जीवन की आशा छोड़ चुके लोग मुट्ठी भर अनाज के लिए किसी भी अत्याचार से पीछे नहीं हटते थे। पूरा क्षेत्र असुरक्षित हो गया था। पक्षियों ने तो पहले ही क्षेत्र छोड़ दिया था। केवल गिद्ध और चीलें ही गगन में घूमती नजर आती थीं। पूरे क्षेत्र में अगर कोई स्वस्थ दिखता था, तो वे ही थे! मरे हुए पशु और मनुष्य की कोई कमी नहीं थी!
दुष्काल और मुगलों का प्रकोप
इसी दुष्काल के साथ शाहजहां की सेना दक्षिण में अपने भीषण प्रकोप का पात्र बना रही थी। दुष्काल से बचे हुए गांव मोगल सेना के आक्रमण से नष्ट हो रहे थे। पूरा क्षेत्र दो साल में नष्ट हो गया।
दुर्ग के भीतर संघर्ष
विश्वासराव ने दुर्ग की कड़ी सुरक्षा की थी। दुर्ग के दरवाजे हमेशा बंद रहते थे। अंदर आने वाले व्यक्ति को पूरे निरीक्षण-परीक्षण के बाद ही उसे अंदर जाने दिया जाता था। दुर्ग के अन्य जलाशय पहले ही सूख चुके थे। गंगा जमुना आधी रह गई थीं। पानी का उपयोग बहुत सावधानी से किया जा रहा था। अनाज और गोदाम की सुरक्षा की जा रही थी।
बाल शिवाजी दो वर्ष का हुआ। उसकी जन्म तिथि दुर्ग की ठंड में संचालित की गई। ठंड समाप्त हो गई। गर्मी आ गई। सभी वर्षा का इंतजार कर रहे थे। मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहे थे...
वर्षा का पहला संकेत
एक दिन दोपहर में पूर्व दिशा में मेघ छा गए। वायु धीरे-धीरे ठहर गई। मेघ आकाश में चढ़ रहे थे। काले और घने। चपला चमकी और धीमी गर्जना हुई। बाल शिवाजी सहित सभी दुर्ग की भीत पर खड़े होकर उन मेघ को देख रहे थे। एक चक्रवात धूल उड़ाते हुए मैदान से निकल गया। पूर्व से ठंडी वायु चलने लगी। बाल शिवाजी ने पूछा,
‘वर्षा आई ?’
‘हाँ, राजे ! आ ही गई।’
चपला फिर चमकी। उस आवाज से गगन चौंक गया। बाल शिवाजीने अपनी माँ को जोर से अलिंगन किया। रानी जिजाबाई बाल शिवाजी के साथ अंदर चली गईं। वर्षा का पर्दा सामने आ रहा था। ओले गिरने लगे। नीचे के सभी लोग दुर्ग में शरण लेने के लिए भागे। ओले उड़ रहे थे। बाल शिवाजी उसे पाने के लिए दौड़ रहे थे।
वर्षा और नई आशा
ओले के बाद वर्षा गिरने लगी। सारे जल-प्रवाह-पथ उफनने लगे। पूरे दुर्ग में जगह-जगह रिसाव हो रहा था। लेकिन किसी को इस बात का दुःख नहीं था। मिट्टी की सुगंध से पूरा वातावरण महक उठा।
वर्षा रुकते ही सभी लोग दुर्ग से बाहर आ गये। एक वर्षा ने धरती का रूप बदल दिया था। पूर्व दिशा में एक इन्द्रधनुष गिरा था। बाल शिवाजी ने उधर इशारा किया; और उन्होंनें कहा,
‘माँ, वह देखो !’
‘बच्चे, वह इंद्रधनुष !’
बाल शिवाजी धीमी आवाज में बोले; लेकिन कुछ जमा नहीं। वह लज्जित हुए।
रानी जिजाबाई का साहसिक निर्णय
दलवा की वर्षा अच्छी हो गई है यह देखकर एक दिन रानी जिजाबाई ने विश्वास राव से कहा,
‘संकट टल गया ! इस साल अच्छी वर्षा होगी।’
‘ऐसा ही लगता है।’
‘वर्षा नहीं हो रही थी, आ गई। अब क्या गलत है ?’
‘रानी साहब ! वर्षा हुई है ; लेकिन गांव सूख गए, वहां की जमीन की देखभाल कौन करेगा ?’
‘कौन है वोह ? वे जो हैं।’
‘जुन्नर की बाकी आधी जनसंख्या दुर्ग पर ही है।’
‘तो चलो दुर्ग ढहा दें।’
‘आह !’
‘आह क्या ? क्षेत्र छोड़ चुके लोगों की ज़मीन, घर दरवाज़ों के लिए आप तब तक उत्तरदायी हैं जब तक वे अपने घर लौटकर नहीं आ जाते ! हम सब नीचे जाते हैं। चलो उतनी खेती बोते हैं।’
पूरे दुर्ग में उत्साह फैल गया। शाही पालकी दुर्ग के नीचे उतर आयी। जुन्नर के आवास में भीड़ थी। गाँव के घरों से उगी घास और उसके स्थान पर सूखी घास देखकर रानी जिजाबाई के नयन भर आए। जितने हाथ में थे, उतने पशु एकत्र कर लिये गये।
नई शुरुआत – खेती और पुनर्जीवन
दुर्ग का लोहार, जो अब तक असली हथियार बनाता था, हल के फाल बनाने लगा। सुतरशाला में कुलाव, डिंडोरी तैयार होने लगा....और एक दिन सुमुहूर्त में भूमिपूजन के साथ जुताई शुरू हो गई। धूप से तपी मिट्टी खिलकर जमीन पर आ गयी। कुकड़ी नदी में बारिश का पानी भर गया।
ऋतु के अनुसार बुआई की गई। पहाड़ी पर हरे अंकुर दिखाई दिए। पर्वत एक बार फिर घने पत्तों से सज गया। घाटी और आसपास के पर्वत से दूध की धाराएँ रिसने लगीं।
सूखे के दौरान तितर-बितर हुए लोग आशा लेकर अपने गांव लौटकर आ रहे थे। वह ऊंचे शिवारा के साथ कठिनाइयों में खुशी-खुशी अंतर्गत हो रही थी।
बाल शिवाजी का स्वभाव
विश्वासराव दुर्ग से बाहर जाये, तब बाल शिवाजी हठ कर उनके साथ रहते थे। वह धूप और बारिश में विश्वासराव के आगे-आगे अपने घोड़े पर सवार होकर घूमता था। उगती हुई फसलों को प्रशंसा की दृष्टि से देखता।
रानी जिजाबाई कहती हैं,
‘मुझे लगता है कि यह एक ग़रीबों का किसान होगा।’
‘तो इसमें अनुचित क्या है ? हर किसी को हमारे जैसे अधिपति मिलते हैं। लेकिन किसान अधिपति मिलना कठिन है।’
आगे की कहानी?
बारिश ने सूखी धरती को फिर से जीवित कर दिया था, लेकिन उस दिन किसी ने यह नहीं समझा कि शिवनेरी की दीवारों पर खड़ा वह नन्हा बालक केवल वर्षा नहीं देख रहा था… वह अपनी प्रजा का दर्द महसूस कर रहा था। उजड़े गांव, भूखे किसान और टूटती इंसानियत ने उसके मन में कुछ ऐसा जगा दिया, जिसने आगे चलकर इतिहास बदल दिया।
जब बाल शिवाजी खेतों में उगती फसल को गर्व से देख रहे थे, तब शायद नियति मुस्कुरा रही थी… क्योंकि यही बालक एक दिन किसानों, गरीबों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए पूरे साम्राज्य से टकराने वाला था।
लेकिन सवाल अब भी बाकी है — क्या उस भयानक दुष्काल ने ही हिंदवी स्वराज्य के बीज बो दिए थे?
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – बाल शिवाजी बचपन से ही प्रजा के दुःख को समझने लगे थे। दुष्काल और किसानों की पीड़ा ने उनके स्वभाव को संवेदनशील बनाया। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें प्रजावत्सल राजा बनाने वाला था।
- राजमाता जिजाबाई – रानी जिजाबाई दूरदर्शी, साहसी और धर्मनिष्ठ माता थीं। उन्होंने संकट में भी जनता और किसानों का साथ नहीं छोड़ा। उनके संस्कारों ने शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व की नींव रखी।
- विश्वासराव – विश्वासराव शिवनेरी दुर्ग की सुरक्षा संभालने वाले विश्वस्त अधिकारी थे। उन्होंने दुष्काल के समय दुर्ग और जनता की रक्षा की। वे बाल शिवाजी के प्रारंभिक जीवन के महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बने।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग केवल एक दुष्काल की कहानी नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण अध्याय है। बचपन में ही उन्होंने भूख, पीड़ा, उजड़े गांव और किसानों का संघर्ष देखा। रानी जिजाबाई द्वारा गांवों को पुनर्जीवित करने का निर्णय उस समय की अद्भुत लोककल्याणकारी सोच को दर्शाता है। यही अनुभव आगे चलकर शिवाजी महाराज की प्रजावत्सल नीति, किसान संरक्षण और न्यायप्रिय शासन की नींव बने। यह घटना हिंदवी स्वराज्य की मानवीय सोच को समझने का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह कथा सिखाती है कि सच्चा नेतृत्व केवल युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि संकट में लोगों का साथ देने में होता है।
- रानी जिजाबाई ने दिखाया कि शासक का पहला धर्म अपनी प्रजा की रक्षा करना है।
- बाल शिवाजी ने बचपन में ही किसानों और गरीबों की पीड़ा को महसूस किया, जिसने उन्हें संवेदनशील और न्यायप्रिय राजा बनाया।
- कठिन समय में साहस, सेवा और दूरदृष्टि ही समाज को फिर से खड़ा कर सकती है।
निष्कर्ष
दुष्काल की इस भयावह घटना ने केवल दक्षिण की धरती को नहीं झकझोरा, बल्कि बाल शिवाजी के मन में प्रजा के प्रति करुणा और जिम्मेदारी का बीज भी बो दिया। रानी जिजाबाई के संस्कार और जनता के संघर्ष ने एक ऐसे भविष्य की नींव रखी, जहां राजा और प्रजा के बीच विश्वास सबसे बड़ी शक्ति बनने वाला था।
विशेष संवाद
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