बाल शिवाजी के बचपन में आया भयंकर दुष्काल… फिर क्या हुआ?
बाल शिवाजी के बचपन में आया भयंकर दुष्काल… फिर क्या हुआ?
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| बाल शिवाजी के बचपन में आया भयंकर दुष्काल… फिर क्या हुआ? |
भयंकर दुष्काल… भूख से तड़पता जनजीवन… और उसी बीच मुगलों का हमला!
जब सब कुछ खत्म होता दिख रहा था, तब जिजाबाई ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने पूरी सूखी धरती को फिर से जीवित कर दिया…
और वहीं से शुरू हुआ बाल शिवाजी के महान भविष्य का बीज…
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की शहाजी महाराज और उनके परिवार की कहानी में, शहाजी महाराज दुर्ग में आठ-दस दिन रहते हैं। दुर्ग में अफरा-तफरी मच जाती है, लेकिन शिवबा के साथ हँसी-खुशी का माहौल बना रहता है। शहाजी महाराज दुर्ग की व्यवस्था देखते हैं और अनाज की स्थिति पर चर्चा करते हैं। अचानक मुगल सम्राट का संदेश आता है, जिसमें दक्षिण की ओर जाने का आदेश होता है। शहाजी महाराज तुरंत जाने की तैयारी करते हैं, ऊमाबाई को सावधान रहने की सलाह देते हैं और रानी जिजाबाई और शिवाजी राजे को विदाई देते हैं। अंत में, शहाजी महाराज बरहान पुर की ओर मार्च करते हैं।
पूरी कहानी पिछे पढ़ें. . .
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
८-१
भयंकर दुष्काल की शुरुआत
बाल शिवाजी एक वर्ष का हुआ, तब क्षेत्र में भयंकर दुष्काल पड़ा।
गांव निर्जन हो रहे थे। पशुओं को छोड़ दिया गया था क्योंकि उन्हें भोजन देना असंभव हो गया था, और वे अनुपजाऊ भूमि में भटक रहे थे। गांव छोड़कर जा रहे लोगों का समूह देश छोड़कर जा रहे थे। अनाज ही संपत्ति बन गया था। सोने की कोई कीमत नहीं थी। जहां भी जाओ, भूखे लोग मार्ग रोककर बैठे रहते थे। जीवन की आशा छोड़ चुके लोग मुट्ठी भर अनाज के लिए किसी भी अत्याचार से पीछे नहीं हटते थे। पूरा क्षेत्र असुरक्षित हो गया था। पक्षियों ने तो पहले ही क्षेत्र छोड़ दिया था। केवल गिद्ध और चीलें ही गगन में घूमती नजर आती थीं। पूरे क्षेत्र में अगर कोई स्वस्थ दिखता था, तो वे ही थे! मरे हुए पशु और मनुष्य की कोई कमी नहीं थी!
दुष्काल और मुगलों का प्रकोप
इसी दुष्काल के साथ शाहजहां की सेना दक्षिण में अपने भीषण प्रकोप का पात्र बना रही थी। दुष्काल से बचे हुए गांव मोगल सेना के आक्रमण से नष्ट हो रहे थे। पूरा क्षेत्र दो साल में नष्ट हो गया।
दुर्ग के भीतर संघर्ष
विश्वासराव ने दुर्ग की कड़ी सुरक्षा की थी। दुर्ग के दरवाजे हमेशा बंद रहते थे। अंदर आने वाले व्यक्ति को पूरे निरीक्षण-परीक्षण के बाद ही उसे अंदर जाने दिया जाता था। दुर्ग के अन्य जलाशय पहले ही सूख चुके थे। गंगा जमुना आधी रह गई थीं। पानी का उपयोग बहुत सावधानी से किया जा रहा था। अनाज और गोदाम की सुरक्षा की जा रही थी।
बाल शिवाजी दो वर्ष का हुआ। उसकी जन्म तिथि दुर्ग की ठंड में संचालित की गई। ठंड समाप्त हो गई। गर्मी आ गई। सभी वर्षा का इंतजार कर रहे थे। मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहे थे...
वर्षा का पहला संकेत
एक दिन दोपहर में पूर्व दिशा में मेघ छा गए। वायु धीरे-धीरे ठहर गई। मेघ आकाश में चढ़ रहे थे। काले और घने। चपला चमकी और धीमी गर्जना हुई। बाल शिवाजी सहित सभी दुर्ग की भीत पर खड़े होकर उन मेघ को देख रहे थे। एक चक्रवात धूल उड़ाते हुए मैदान से निकल गया। पूर्व से ठंडी वायु चलने लगी। बाल शिवाजी ने पूछा,
‘वर्षा आई ?’
‘हाँ, राजे ! आ ही गई।’
चपला फिर चमकी। उस आवाज से गगन चौंक गया। बाल शिवाजीने अपनी माँ को जोर से अलिंगन किया। रानी जिजाबाई बाल शिवाजी के साथ अंदर चली गईं। वर्षा का पर्दा सामने आ रहा था। ओले गिरने लगे। नीचे के सभी लोग दुर्ग में शरण लेने के लिए भागे। ओले उड़ रहे थे। बाल शिवाजी उसे पाने के लिए दौड़ रहे थे।
वर्षा और नई आशा
ओले के बाद वर्षा गिरने लगी। सारे जल-प्रवाह-पथ उफनने लगे। पूरे दुर्ग में जगह-जगह रिसाव हो रहा था। लेकिन किसी को इस बात का दुःख नहीं था। मिट्टी की सुगंध से पूरा वातावरण महक उठा।
वर्षा रुकते ही सभी लोग दुर्ग से बाहर आ गये। एक वर्षा ने धरती का रूप बदल दिया था। पूर्व दिशा में एक इन्द्रधनुष गिरा था। बाल शिवाजी ने उधर इशारा किया; और उन्होंनें कहा,
‘माँ, वह देखो !’
‘बच्चे, वह इंद्रधनुष !’
बाल शिवाजी धीमी आवाज में बोले; लेकिन कुछ जमा नहीं। वह लज्जित हुए।
रानी जिजाबाई का साहसिक निर्णय
दलवा की वर्षा अच्छी हो गई है यह देखकर एक दिन रानी जिजाबाई ने विश्वास राव से कहा,
‘संकट टल गया ! इस साल अच्छी वर्षा होगी।’
‘ऐसा ही लगता है।’
‘वर्षा नहीं हो रही थी, आ गई। अब क्या गलत है ?’
‘रानी साहब ! वर्षा हुई है ; लेकिन गांव सूख गए, वहां की जमीन की देखभाल कौन करेगा ?’
‘कौन है वोह ? वे जो हैं।’
‘जुन्नर की बाकी आधी जनसंख्या दुर्ग पर ही है।’
‘तो चलो दुर्ग ढहा दें।’
‘आह !’
‘आह क्या ? क्षेत्र छोड़ चुके लोगों की ज़मीन, घर दरवाज़ों के लिए आप तब तक उत्तरदायी हैं जब तक वे अपने घर लौटकर नहीं आ जाते ! हम सब नीचे जाते हैं। चलो उतनी खेती बोते हैं।’
पूरे दुर्ग में उत्साह फैल गया। शाही पालकी दुर्ग के नीचे उतर आयी। जुन्नर के आवास में भीड़ थी। गाँव के घरों से उगी घास और उसके स्थान पर सूखी घास देखकर रानी जिजाबाई के नयन भर आए। जितने हाथ में थे, उतने पशु एकत्र कर लिये गये।
नई शुरुआत – खेती और पुनर्जीवन
दुर्ग का लोहार, जो अब तक असली हथियार बनाता था, हल के फाल बनाने लगा। सुतरशाला में कुलाव, डिंडोरी तैयार होने लगा....और एक दिन सुमुहूर्त में भूमिपूजन के साथ जुताई शुरू हो गई। धूप से तपी मिट्टी खिलकर जमीन पर आ गयी। कुकड़ी नदी में बारिश का पानी भर गया।
ऋतु के अनुसार बुआई की गई। पहाड़ी पर हरे अंकुर दिखाई दिए। पर्वत एक बार फिर घने पत्तों से सज गया। घाटी और आसपास के पर्वत से दूध की धाराएँ रिसने लगीं।
सूखे के दौरान तितर-बितर हुए लोग आशा लेकर अपने गांव लौटकर आ रहे थे। वह ऊंचे शिवारा के साथ कठिनाइयों में खुशी-खुशी अंतर्गत हो रही थी।
बाल शिवाजी का स्वभाव
विश्वासराव दुर्ग से बाहर जाये, तब बाल शिवाजी हठ कर उनके साथ रहते थे। वह धूप और बारिश में विश्वासराव के आगे-आगे अपने घोड़े पर सवार होकर घूमता था। उगती हुई फसलों को प्रशंसा की दृष्टि से देखता।
रानी जिजाबाई कहती हैं,
‘मुझे लगता है कि यह एक ग़रीबों का किसान होगा।’
‘तो इसमें अनुचित क्या है ? हर किसी को हमारे जैसे अधिपति मिलते हैं। लेकिन किसान अधिपति मिलना कठिन है।’
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – इस कथा में बाल शिवाजी का प्रारंभिक जीवन और उनका स्वभाव दिखाई देता है। बचपन से ही वे प्रकृति, खेती और प्रजा के जीवन से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
- रानी जिजाबाई – रानी जिजाबाई दूरदर्शी और प्रजावत्सल शासक के रूप में दिखती हैं। वे दुष्काल के बाद खेती शुरू करवाकर लोगों को जीवन की नई आशा देती हैं।
- विश्वासराव – विश्वासराव दुर्ग की सुरक्षा और व्यवस्था के जिम्मेदार थे। उन्होंने कठिन समय में दुर्ग की सुरक्षा और अनाज के भंडार को सुरक्षित रखा।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह कथा उस कठिन समय का वर्णन करती है जब महाराष्ट्र क्षेत्र में भीषण दुष्काल पड़ा था। इस समय लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। इस परिस्थिति में रानी जिजाबाई ने खेती को पुनः शुरू कराकर लोगों में जीवन की आशा जगाई। यह घटना शिवाजी महाराज के बचपन के संस्कारों और उनके भविष्य के नेतृत्व की झलक दिखाती है।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और सही नेतृत्व से समाज को नई दिशा दी जा सकती है।
- रानी जिजाबाई की दूरदर्शिता और शिवाजी महाराज के संस्कार भविष्य में एक महान शासक के निर्माण की नींव बनते हैं।
निष्कर्ष
श्रीमानयोगी की यह कथा बाल शिवाजी के बचपन की परिस्थितियों और उस समय के सामाजिक जीवन का चित्रण करती है। यह कहानी बताती है कि किस प्रकार कठिन समय में भी सही नेतृत्व और परिश्रम से समाज को फिर से समृद्ध बनाया जा सकता है।

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