जुन्नार में क्या हुआ? शहाजी महाराज और जिजाबाई का रहस्य
जुन्नार में क्या हुआ? शहाजी महाराज और जिजाबाई का रहस्य
![]() |
| जुन्नार में क्या हुआ? शहाजी महाराज और जिजाबाई का रहस्य |
शिवनेरी की तलहटी में घटित यह क्षण केवल एक पारिवारिक बिछोह नहीं, बल्कि इतिहास की दिशा बदलने वाला मोड़ है। शहाजी महाराज और रानी जिजाबाई के बीच लिया गया यह कठिन निर्णय, जहां एक ओर सुरक्षा की मजबूरी है, वहीं दूसरी ओर दिल को चीर देने वाला अलगाव भी। गर्भवती रानी जिजाबाई को विश्वासराव के संरक्षण में छोड़कर शहाजी महाराज अपने पुत्र शंभूराजे के साथ आगे बढ़ जाते हैं—लेकिन क्या यह फैसला सही साबित होगा?
महल के भीतर रानी जिजाबाई की चिंता और बाहर बढ़ते खतरे की आहट, दोनों मिलकर एक अनदेखा तूफान खड़ा कर रहे हैं। क्या दुश्मन उनकी तलाश में यहाँ तक पहुँच जाएगा? क्या शंभूराजे सुरक्षित रह पाएंगे, या उनका भविष्य भी इस संघर्ष में उलझ जाएगा?
हर कदम पर बढ़ती बेचैनी, हर पल छिपा हुआ खतरा… यह कहानी केवल इतिहास नहीं, बल्कि साहस, त्याग और अनिश्चितता की गूंज है, जो आगे क्या मोड़ लेगी, यह जानने के लिए आपको अंत तक पढ़ना ही होगा।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन, उनके संघर्ष और स्वराज्य की स्थापना की कहानी बताई गई है। लेखक रणजित देसाई जी ने इस उपन्यास में शिवाजी महाराज के बचपन, उनकी माता जिजाबाई से मिली प्रेरणा, दुर्ग की विजय, युद्ध कौशल और प्रशासनिक नीतियों को विस्तार से वर्णित किया है।
यह उपन्यास केवल ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि साहस, नेतृत्व, देशभक्ति और स्वाभिमान की प्रेरणा भी देता है। अंत में बताया गया है कि शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी।
पिछे पढ़ें. . .
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१
आमराई में प्रतीक्षा का क्षण
पश्चिम की ओर झुके सूरज की तिरछी किरणों में, शिवनेरी के तलहटी में स्थित जुन्नार गाँव उभरकर दिखाई दे रहा था। जुन्नार से थोड़ी दूरी पर स्थित आमराई में शहाजी महाराज की घुड़सवार सेना रुकी हुई थी। एक घने आम के पेड़ के नीचे, शहाजी महाराज अपने छोटे पुत्र संभाजी राजे के साथ खड़े थे।
दोपहर ढलने के बावजूद अभी तक हवा नहीं चल रही थी। पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे। रात की ठंडक अभी शुरू नहीं हुई थी। आमराई से दिखाई देने वाले रास्ते की ओर दोनों का ध्यान बार-बार जा रहा था। कोई भी दृष्टि क्षेत्र में नहीं आ रहा था। समय के साथ शहाजी महाराज और भी अधिक बेचैन होते जा रहे थे।
संभाजी राजे की सूचना
‘आबा साहब, माँ साहब आ गए हैं।’ शंभूराजे ने कहा।
‘कहाँ ?’ शहाजी महाराज ने सिर उठाकर पूछा।
शंभूराजे ने जिस दिशा में इशारा किया था, शहाजी महाराज ने उस ओर देखा। तिरछी सूर्य किरणों में धूल उड़ाते हुए आ रहे अश्वदल दिखाई दे रहे थे। धीरे-धीरे घोड़ों के टापों की आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगी। आमराई के पास आते ही आने वाले दल की गति धीमी हो गई। घोड़े रुक गए। तीन घोड़े धीमी गति से आगे बढ़ने लगे।
रानी जिजाबाई का आगमन
घोड़े की सवारी से थकी हुई रानी जिजाबाई के चेहरे पर संभाजी राजे को देखकर एक मंद मुस्कान आ गई। रानी जिजाबाई अपनी दासी के सहारे घोड़े से उतरीं। श्रम से उनका पूरा चेहरा लाल हो गया था - आँखें लाल दिख रही थीं। तीन महीने के गर्भ से रानी जिजाबाई ने अपना पसीना पोंछा। पल्लू ठीक करके वह शहाजी महाराज के सामने आईं।
महत्वपूर्ण संवाद
‘अगर हम इस तरह बार-बार रुकते रहे, तो आपके पिता के हाथों में पड़ने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।’
‘मैं भी यही कहने वाली थी !’
‘क्या मतलब ?’ शहाजी महाराज ने पूछा।
‘हमें आगे बढ़ना चाहिए।’
‘और आप ?’
‘मुझे नहीं लगता कि मैं आगे की यात्रा कर पाऊंगी।’
‘तो आपको इस तरह बीच रास्ते में छोड़कर ...’
‘हमारे नजदीकी विश्वासराव हैं। मैं उनके पास रुक सकती हूं। अगर आप सुरक्षित हैं, तो हम भी सुरक्षित हैं। एक पल की भी कीमत बहुत है...’
शहाजी महाराज अचानक क्रोध से भर उठे, ‘यह आपके पिता का प्रताप है। हम उसका क्या कर सकते हैं ? जाधवों और भोसलों के बीच की दुश्मनी को पीढ़ी दर पीढ़ी चलाने के लिए हम भी सक्षम हैं, कहना उन्हें।’
‘मैं इसमें क्या कह सकती हूं ?' रानी जिजाबाई ने कहा।
‘आप जो कहेंगी, वही करेंगे। अगर आपके पिता को खून की लाज है, तो वह आपको छोड़ देंगे, या फिर आपको ले जाएँगे। आपका भाग्य और आप। हमें अब ज्यादा सोचने का समय नहीं है। बोलिए, यह तय है ?’
अपने आंसुओ को मुश्किल से रोकते हुए, बिना कुछ कहे रानी जिजाबाई अपने घोड़े की ओर मुड़ गईं।
जुन्नार में आश्रय
जुन्नार में खबर पहुंची। शहाजी महाराज के व्याही विजयराव सिधोजी विश्वासराव खुद सामने आए; रानी जिजाबाई और शहाजी महाराज को सम्मान के साथ अपने महल में ले गए। महल में बैठकी पर जाते ही शहाजी महाराज ने कहा,
‘विश्वासराव, मजबूरी में हमें आपको यह कष्ट देना पड़ रहा है। इसके लिए हम शर्मिंदा हैं।’ उन्होंने कहा।
‘राजे, ऐसा मत कहिए। आपकी सेवा में आने का अवसर मिलना हमारे लिए सौभाग्य है। हम जीवन की बाजी लगाकर भी रानी साहब की सेवा करेंगे।’
‘अगर हमें विश्वास नहीं होता, तो हम यहां नहीं आते, और अब हमें रुकना नहीं है। शंभूराजे, चलना है ना ? या रुकना है ?’
रानी जिजाबाई की नजरों से बचते हुए शंभूराजे ने कहा, ‘हम आ रहे हैं।’
‘शाबास !’ शहाजी महाराज ने कहा।
‘कुछ दिन बालक यहां रहेगा, और सब कुछ सुरक्षित रूप से पार हो जाने के बाद उसे भेजा, तो क्या यह ठीक नहीं होगा ?’ रानी जिजाबाई ने कहा।
‘सुनिए, विश्वासराव। बालक को खतरा है, हमें नहीं।’
‘मैंने ऐसा नहीं कहा।’ रानी जिजाबाई ने जल्दी से कहा।
‘हम शंभूबाल को ले जाएंगे। उनके माध्यम से हमें बहुत सारे मनसूबे पूरे करने हैं, रानी साहब। आपके लिए हम बालकृष्ण हनुमंते, संक्रोजी नीळकंठ, सोनोजीपंत, कोरडे ये सभी लोग छोड़कर जा रहे हैं। कुछ सिपाही भी हैं। हम स्थिर हो जाएँगे, तो आपको ले जाएँगे। अपनी तबीयत का ख्याल रखिए।’
भावनात्मक विदाई
शंभूराजे रानी जिजाबाई के पैरों को छुने के लिए झुके, तो रानी जिजाबाई ने उन्हें आलिंगन किया। शंभूराजे ने उस आलिंगन से खुद को छुड़ा लिया। रानी जिजाबाई के मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे। वह शंभूराजे की छवि को अपनी आँखो में बसा रही थीं। आँखें भर आने पर वह छवि धुंधली हो गई। जब उन्होंने अपनी आँखें पोंछी, तो शंभूराजे शहाजी महाराज के साथ महल से बाहर जा रहे थे - एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
रानी जिजाबाई ने खड़े-खड़े अपनी आँखो पर पल्लू डाल लिया। विश्वासराव की पत्नी लक्ष्मीबाई उनके पास आईं, और रानी जिजाबाई का हाथ पकड़कर उन्हें अंदर ले जा रही थीं। पर अंदर जाते हुए, बाहर उठते हुए घोड़ों के खुरों की आवाज से कान बंद नहीं किए जा सकते थे।
आगे की कहानी?
क्या रानी जिजाबाई इस कठिन परिस्थिति में खुद को संभाल पाएंगी? क्या शहाजी महाराज अपने शत्रुओं से बचकर सुरक्षित निकल सकेंगे, या कोई नया संकट उनका इंतजार कर रहा है? उधर, छोटे शंभूराजे के मन में क्या चल रहा है—क्या वे इस बिछोह को समझ पाएंगे?
विश्वासराव के महल में रानी जिजाबाई का भविष्य किस मोड़ पर जाएगा? हर पल बढ़ता तनाव, हर निर्णय का भारी परिणाम… इस रोमांचक और भावनात्मक कथा का अगला अध्याय और भी चौंकाने वाला है। जानने के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- शहाजी महाराज भोसले – मराठा साम्राज्य के प्रमुख सरदार और शिवाजी महाराज के पिता।
- राजमाता जिजाबाई – महान आदर्शों वाली माता जिन्होंने शिवाजी महाराज को स्वराज्य का संस्कार दिया।
- संभाजी राजे (शंभूराजे) – शहाजी महाराज और रानी जिजाबाई के पुत्र, जिनका बचपन इस संघर्षपूर्ण वातावरण में बीता।
- विश्वासराव – शहाजी महाराज के विश्वासपात्र, जिन्होंने संकट के समय रानी जिजाबाई को आश्रय दिया।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग मराठा इतिहास में परिवार, कर्तव्य और संघर्ष के महत्व को दर्शाता है।
इस घटना से यह समझ आता है कि महान नेताओं के जीवन में व्यक्तिगत त्याग और कठिन परिस्थितियां कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- महान व्यक्तित्वों के जीवन में त्याग और साहस का विशेष महत्व होता है।
- परिवार और राज्य के हितों के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं।
निष्कर्ष
यह कथा मराठा इतिहास का एक भावनात्मक और प्रेरणादायक प्रसंग है। इसमें शहाजी महाराज, रानी जिजाबाई और बाल संभाजी राजे के जीवन की परिस्थितियाँ दिखती हैं, जो आगे चलकर स्वराज्य की महान परंपरा की नींव बनती हैं।
विशेष संवाद
संबंधित लेख
शहाजी महाराज ने शिवाजी महाराज को दी रहस्यमयी बंदूक!
संभाजी राजे ने शिवाजी महाराज को अनसुना क्यों किया?

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें