शिवाजी राजे का प्रशिक्षण – भाला और तलवार का कौशल
शिवाजी राजे का प्रशिक्षण – भाला और तलवार का कौशल
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| शिवाजी राजे का प्रशिक्षण – भाला और तलवार का कौशल |
दो केले… दो तलवारें… और एक ऐसा वार जिसने सबको भ्रम में डाल दिया।
बाल शिवाजी ने पलक झपकते ही दोनों केले पर वार किया, लेकिन आश्चर्य—केले वैसे ही खड़े रहे! चौक में खड़े सभी लोग हंस पड़े। क्या वार चूक गया था? क्या यह सिर्फ दिखावा था?
सईबाई की हंसी के बीच मां साहब ने इशारा किया—और तभी सामने आया असली सच। जैसे ही नानू उस्ताद ने केले को हल्का सा धक्का दिया… दोनों केले बीच से एकदम बराबर कटकर गिर पड़े!
पूरा चौक स्तब्ध रह गया। यह सिर्फ ताकत नहीं थी—यह था अद्भुत नियंत्रण, सटीकता और कला।
सईबाई की आंखों में आश्चर्य और चेहरे पर लज्जा थी… और उसी क्षण एक ऐसा सवाल पूछा गया, जिसने इस घटना को इतिहास में बदल दिया।
क्या यह सिर्फ एक खेल था? या फिर यहीं से शुरू हुई एक नई कहानी—शौर्य और संबंध की?
पूरा रहस्य जानने के लिए पूरी कहानी जरूर पढ़ें…
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की मां साहब के सामने एक साधारण खेल नहीं, बल्कि भविष्य के एक महान योद्धा की परीक्षा होने वाली थी। बालराजे हाथ में लाठी लिए खड़े थे… सामने उनके गुरु नानू उस्ताद। हर वार के साथ चौक में गूंजती आवाजें जैसे आने वाले समय का संकेत दे रही थीं। अचानक एक तेज़ हमला… और लाठी हाथ से छूट गई! क्या बालराजे हार गए?
मां साहब की आंखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन नानू के चेहरे पर एक अलग ही आत्मविश्वास था… मानो वह कुछ और ही दिखाना चाहते हों।
तभी भाला हाथ में आया। लक्ष्य रखा गया — एक साधारण सा केला… लेकिन यह सिर्फ निशाना नहीं था, यह था साहस, नियंत्रण और कौशल की असली परीक्षा।
राजे आगे बढ़े… एक पल की शांति… और फिर बिजली जैसी गति से भाला हवा को चीरता हुआ निकला!
अगले ही क्षण जो हुआ… उसे देखकर सब दंग रह गए।
क्या था वह अद्भुत दृश्य? जानने के लिए पूरी कहानी जरूर पढ़ें…
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१०-३
चौक में अद्भुत तैयारी
चौक से केले हटा दिए गए; और चौक में दो और केले लाए गए। मां साहब की बैठक के सामने दोनों केले आठ हाथ की दूरी पर समानांतर रखे गए। शिवाजी राजे ने दोनों हाथों में तलवारें उठाईं।
बाल शिवाजी की दृढ़ मुद्रा
चौक में आकर उन्होंने तलवार का पवित्रा लिया। बाल शिवाजी दृढ़ मुद्रा में खेल रहे थे, फिर भी उनके होंठों पर मुस्कान छिपी नहीं थी। अपनी तीक्ष्ण नजर से उन्होंने मैदान का निरीक्षण किया।
झुककर अभिवादन और सम्मान
हाथ का अंदाजा लगाया। चौक का चक्कर लगाकर उन्होंने दायां घुटना टेका। दाहिने हाथ की तलवार सीधी थी। बायां हाथ फैला हुआ था। शिवाजी राजे का सिर झुका हुआ था।
उन्होंने मां साहब को अभिवादन किया। नजर ऊपर उठी, तो मुस्कुराते हुए मां साहब ने सिर हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया। शिवाजी राजे की नजर दादोजी पर गई। उन्होंने भी सिर हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया।
तलवार का चौंकाने वाला वार
बालराजे उठे। हाथ घुमाने लगे। हाथ घुमाते हुए वे केले के बीच में खड़े हो गए। दोनों केले का अंदाजा लगाया, और पलक झपकते ही दोनों केले पर वार किया। शिवाजी राजे ने फिर से अभिवादन किया।
सस्पेंस बना रहा
दोनों केले वैसे ही खड़े थे। सईबाई हंस पड़ीं। मां साहब ने सईबाई की ओर देखा।
'नानू उस्ताद! हमारी सईबाई को, राजे ने क्या किया, दिखाओ।'
सच्चाई का खुलासा
नानू उस्ताद आगे बढ़े। दोनों केले को धक्का देते ही दोनों केले बीच से टूट गए। समान दूरी पर वे काटे गए थे।
टूटे केले को देखते ही सईबाई की आंखें चौड़ी हो गईं। वह बोलीं,
'अरे बाप रे !' और उसने पल्लू मुंह पर रख लिया।
हंसी और भावनाएं
सभी हंस पड़े। शर्म से लाल सई को गले लगाते हुए मां साहब ने कहा,
'सई, यह पति तुम्हें पसंद है ?'
सईबाई ने एक बार मां साहब की ओर देखा। अगले ही क्षण तलवारें उतारते हुए शिवाजी राजे की ओर देखकर मां साहब से जोर से कहा,
'हां, पसंद है।'
मां साहब निष्पक्ष हो गईं। सई को पास लेकर उन्होंने कहा,
‘हाथ, गधी ! ऐसे ‘हा’ कहकर बताते हैं क्या ?’
मां साहब की उपस्थिति भूलकर सारा चौक हंसी से भर गया।
विवाह प्रस्ताव
हंसी शांत होते ही दादोजी स्थिर आवाज में बोले,
'मां साहब, एक निवेदन है।'
'क्या, दादोजी ?'
‘बात निकली ही है। अगर कोई आपत्ति न हो, तो इस बात को पक्का कर दें। राजे भी अब दस साल के हो जाएंगे। जोड़ी भी शोभा देगी।’
निर्णय की दिशा
‘नानू उस्ताद ! दादोजी क्या कह रहे हैं ?’
नानू ने कहा, ‘सही कह रहे हैं। बार उड़ा दें। सब कुछ हो गया... वाड़ा बन गया, चौक बन गया, लिखना-पढ़ना हो गया। बहू के बिना घर की शोभा है, क्या ? इस वर्ष कर दें।’
‘अरे, लेकिन निंबालकर मामा क्या कहते हैं, उन्हें तो पूछो। बेटी उनकी है।’
‘ऐसे शब्द मत कहो, मां साहब ! बेटी हमारी है। महाराज की कृपा से जान बची, जागीर मिली, अनाज मिला। बेटी को गोद में लिया, तो अब तक के उपकारों पर, ऋणानुबंधों पर उत्कर्ष चढ़ेगा।’
‘जगदंबा के मन में होगा, तो हो जाएगा। पहले से चला आ रहा संबंध आगे बढ़ेगा... दादोजी !’
‘जी ?’
'अच्छा समय देखकर बंगलौर में तुरंत संदेश भेजो। हमारी इच्छा सबको बताओ।'
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- शिवाजी राजे – मराठा साम्राज्य के संस्थापक, अद्भुत शौर्य और बुद्धिमत्ता के प्रतीक।
- मां साहब (रानी जिजाबाई) – शिवाजी राजे की माता, जिनके संस्कारों ने उन्हें महान बनाया।
- सईबाई – शिवाजी महाराज की पत्नी, सरल और सौम्य स्वभाव की।
- दादोजी कोंडदेव – शिवाजी राजे के गुरु और मार्गदर्शक।
- नानू उस्ताद – शस्त्रकला के विशेषज्ञ।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग बाल शिवाजी की असाधारण युद्धकला और मानसिक एकाग्रता को दर्शाता है। इतनी कम उम्र में उनका नियंत्रण, सटीकता और अनुशासन उनके भविष्य के महान योद्धा बनने का संकेत देता है। साथ ही यह घटना उनके विवाह के निर्णय का आधार भी बनी, जो मराठा इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ था।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- धैर्य, अभ्यास और आत्मविश्वास से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
- बाहरी दिखावे पर विश्वास न करके सच्चाई को समझना जरूरी है।
- साथ ही जीवन में सही समय पर लिए गए निर्णय भविष्य को दिशा देते हैं।
निष्कर्ष
यह घटना केवल एक खेल नहीं थी, बल्कि शिवाजी राजे के व्यक्तित्व, उनकी कला और उनके भविष्य की झलक थी। यही गुण उन्हें महान बनाते हैं।

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