लाठी हाथ से छूट गई… फिर बालराजे ने जो किया, सब दंग रह गए!
लाठी हाथ से छूट गई… फिर बालराजे ने जो किया, सब दंग रह गए!
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| लाठी हाथ से छूट गई… फिर बालराजे ने जो किया, सब दंग रह गए! |
मां साहब के सामने एक साधारण खेल नहीं, बल्कि भविष्य के एक महान योद्धा की परीक्षा होने वाली थी। बालराजे हाथ में लाठी लिए खड़े थे… सामने उनके गुरु नानू उस्ताद। हर वार के साथ चौक में गूंजती आवाजें जैसे आने वाले समय का संकेत दे रही थीं। अचानक एक तेज़ हमला… और लाठी हाथ से छूट गई! क्या बालराजे हार गए?
मां साहब की आंखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन नानू के चेहरे पर एक अलग ही आत्मविश्वास था… मानो वह कुछ और ही दिखाना चाहते हों।
तभी भाला हाथ में आया। लक्ष्य रखा गया — एक साधारण सा केला… लेकिन यह सिर्फ निशाना नहीं था, यह था साहस, नियंत्रण और कौशल की असली परीक्षा।
राजे आगे बढ़े… एक पल की शांति… और फिर बिजली जैसी गति से भाला हवा को चीरता हुआ निकला!
अगले ही क्षण जो हुआ… उसे देखकर सब दंग रह गए।
क्या था वह अद्भुत दृश्य? जानने के लिए पूरी कहानी जरूर पढ़ें…
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की पुणे… जो कभी उजड़ा हुआ था, अब धीरे-धीरे फिर बस रहा था। लेकिन इस बदलती जमीन पर सिर्फ गांव ही नहीं बस रहे थे…
एक भविष्य भी आकार ले रहा था। बाल शिवाजी हर दृश्य को ध्यान से देख रहे थे—लोगों के दुख, फैसलों की गंभीरता, और युद्धकला की तैयारी।
तभी एक दिन वाड़े में आए मुधोजी निंबालकर… और उनके साथ आई एक मासूम बच्ची—सईबाई। किसी ने नहीं सोचा था कि यह मुलाकात इतिहास का रुख बदल देगी।
उधर चौक में तलवारों की टकराहट गूंज रही थी… और इधर एक छोटी सी जिज्ञासा कुछ बड़ा संकेत दे रही थी।
आखिर सई क्या कहना चाहती थी? और यह क्षण क्यों इतना खास था?
पूरी कहानी आपको चौंका देगी…
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
१०-२
खेल देखने का आग्रह
'मां साहब, देखिए ना ! बाहर खेल चल रहे हैं। आबा देखने नहीं आ रहे हैं।'
'बहुत सताती है यह बच्ची !' मुधोजी बोले।
'चलो, मुधोजी ! हम भी खेल देखने चलें। बहुत दिनों से हमें भी समय नहीं मिला।'
मां साहब उठीं। मुधोजी को भी उठना पड़ा। मां साहब का हाथ पकड़कर सई बाहर आई।
सभा में मां साहब का आगमन
मां साहब को देखकर दादोजी उठे। सभा के लोग झुककर अभिवादन करके किनारे हो गए। मां साहब बैठक पर बैठीं। दादोजी, मुधोजी अदब से किनारे बैठ गए। चौक में चार जोड़ी तलवारें खेल रही थीं।
उस्ताद ने झुककर अभिवादन किया तो मां साहब ने पूछा,
'नानू उस्ताद, हमारे बालराजे को नया क्या सिखाया ?'
लाठी कला का प्रदर्शन
नानू बूढ़ा था, फिर भी उसकी सूखी हड्डियों में तेज था। वह बोला, 'मां साहब ! दिखाता हूँ अभी।'
नानू ने निर्देश दिए। चौक खाली हो गया। नानू बोला,
'राजे, लाठी उठाओ।'
लाठी उठाई। राजे ने लाठी घुमाना शुरू किया। साधी, बगली, चक्री सभी प्रकार करके दिखाए। चक्री लाठी के समय तो लाठी की गूंज सुनाई दे रही थी। तीन हाथ होते ही नानू ने लाठी उठाई। राजे के सामने जाकर वह बोला,
'ध्यान से, हा राजे ! नहीं तो पिछली बार की तरह बेवकूफी कर बैठोगे।'
सभी हस पड़े। नमन करके, हाथों पर थूककर नानू ने लाठी उठाई। बालराजे ने उनका अनुकरण किया।
‘राजे, करो मोहराऽऽ !’
गंभीर मुकाबला
राजे ने लाठी उठाई। लाठी के वार हो रहे थे। नानू उन वारों को लाठी पर झेल रहा था। वह पीछे हट रहा था। खट खट आवाजें आ रही थीं। सभी लोग कौतुक से देख रहे थे। अचानक नानू चिल्लाया,
'राजे, संभालो !'
और नानू ने मोहरा किया। नानू के घाव राजे लाठी पर झेल रहे थे। डर के मारे जिजाऊ की आंखें तनी हुई थीं। नानू तेजी से आगे बढ़ रहा था। राजे पीछे हट रहे थे... और राजे के हाथ से लाठी छूट गई। नानू ने मां साहब की ओर देखा। मां साहब ने निःश्वास छोड़ते हुए कहा,
'नानू, ध्यान से ! तुम बच्चे के साथ खेल रहे हो, यह भूल गए हो शायद।'
'नहीं, मां साहब ! इस खेल में छोटा-बड़ा क्या? जो पहले साध ले, वही जीते। अभी राजे का हाथ मजबूत नहीं हुआ है, इसलिए लाठी छूट गई। ऐसे ही सीखना है।'
भाला फेंकने की अद्भुत कला
उसी समय केले के गुच्छे लाए गए। चौक में खूँटी पर केला खड़ा किया गया; और राजे के हाथ में भाला दिया गया। राजे की ऊंचाई से भाला डेढ़ हाथ ऊंचा था। भाले के नीचे चांदी के कड़े खनक रहे थे। कड़े के नीचे बड़ा सा गोंडा था। भाले के सिरे पर रेशमी काढ़नी थी। राजे ने केले से दूर जाना शुरू किया। वे दूसरे सिरे पर गए। काढ़नी को हाथ में लपेटकर पवित्रा लेकर खड़े हो गए। नानू चिल्लाया,
'राजे, आगे बढ़ो !'
मस्त चाल से राजे झपटे। केले से आठ हाथ दूर राजे पहुंचे; और एक जोर से भाला फेंका। सरसराते हुए भाला निकला; और केले में धंस गया।
खींचते ही उसी क्षण भाला वापस राजे के हाथ में आ गया। मुधोजी बोले,
'वाह, राजे !'
सईबाई मां साहब के पास बैठकर यह सब कौतुक से देख रही थीं।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- मां साहब (जिजाऊ) – शिवाजी महाराज की माता, जिन्होंने उन्हें वीरता और धर्म की शिक्षा दी।
- बालराजे (शिवाजी महाराज) – मराठा साम्राज्य के संस्थापक, बचपन से ही वीर और कुशल योद्धा।
- नानू उस्ताद – युद्ध कला के शिक्षक, जिन्होंने राजे को लाठी और भाला चलाना सिखाया।
- मुधोजी – वाड़े के विश्वसनीय व्यक्ति।
- सईबाई – मुधोजी की बेटी, जो यह दृश्य देख रही थीं।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग दर्शाता है कि शिवाजी महाराज बचपन से ही युद्ध कला में निपुण थे। उनकी प्रशिक्षण प्रक्रिया कठोर और वास्तविक थी, जिसने उन्हें आगे चलकर महान योद्धा बनाया।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- कठिन अभ्यास और अनुशासन ही सफलता की कुंजी है।
- उम्र छोटी हो या बड़ी, सीखने के लिए समर्पण आवश्यक है।
निष्कर्ष
बाल शिवाजी का यह प्रशिक्षण केवल खेल नहीं था, बल्कि उनके भविष्य के महान नेतृत्व की नींव थी।

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