रानी जिजाबाई का न्याय और पुणे विनाश की खबर
रानी जिजाबाई का न्याय और पुणे विनाश की खबर
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| रानी जिजाबाई का न्याय और पुणे विनाश की खबर |
अकाल से जूझती धरती… भूख से तड़पती प्रजा… और उसी बीच एक ऐसा निर्णय, जिसने एक निर्दोष की जान बचा ली — लेकिन यह तो बस शुरुआत थी।
रानी जिजाबाई ने दया दिखाकर एक अपराधी को जीवनदान दिया, पर उन्हें क्या पता था कि आने वाले पल उनकी दुनिया हिला देंगे। शांत शाम, सुंदर जुन्नर का दृश्य… सब कुछ सामान्य लग रहा था। तभी एक खबर बिजली की तरह गिरी — पुणे जल चुका था! मुरार जगदेव ने शहर को राख में बदल दिया था।
दिल संभल भी नहीं पाया था कि एक और आघात आया — अपने ही परिवार पर हमला, अपहरण, अपमान… और चारों ओर फैलता भय।
महल का हर चेहरा बदल गया… हंसी गायब, आंखों में डर और दिल में अनकहा रहस्य।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था…
क्या यह सब यहीं खत्म हो जाएगा? या यहीं से शुरू होगा एक ऐसा इतिहास, जो पूरी दुनिया बदल देगा?
आगे क्या हुआ… यह जानकर आप भी चौंक जाएंगे।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की दुर्ग पर सब कुछ शांत था… समय धीरे-धीरे बीत रहा था। रानी जिजाबाई का जीवन अनुशासन, भक्ति और सादगी से भरा हुआ था। लेकिन उस शांति के भीतर कुछ और भी पल रहा था—एक नई उम्मीद, एक नया भविष्य।
दिन वैसे ही शुरू हुआ जैसे हर दिन होता था… लेकिन शाम होते-होते सब बदल गया।
एक साधारण सैर के दौरान अचानक एक खबर ने माहौल को गंभीर बना दिया—टकमक पर किसी को सजा दी जाने वाली थी।
कौन था वह अपराधी? उसका अपराध क्या था?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या वह सजा उचित थी?
रानी जिजाबाई के मन में सवाल उठने लगे। उनका शांत चेहरा अब निर्णय के द्वार पर खड़ा था। एक ओर कठोर न्याय, दूसरी ओर करुणा…
अब जो होने वाला था, वह केवल एक व्यक्ति की किस्मत नहीं, बल्कि न्याय की परिभाषा तय करने वाला था।
आखिर रानी जिजाबाई क्या निर्णय लेंगी?
यह जानने के लिए आपको पूरी कहानी पिछे पढ़नी होगी. . .
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
४-२
अकाल और न्याय का क्षण
‘रानी साहब, यह अवर्षण के दिन। ऐसे अपराधिक घटनाएं घटने लगी, तो विपत्ति से ग्रस्त क्षेत्र को बिखरने में वक्त नहीं लगता।’
‘सत्ता तुम्हारी। तुम्हारे लिए बाधा बन्ना हमारे लिए उचित नहीं। लेकिन, विश्वासराव, प्रजा को पर्याप्त खाना नहीं, यह दोष तुम पर भी नहीं आता क्या ? क्या किसी को चोरी की आदत हो सकती है ?’
‘आपका क्या हुकूम है ?’
‘हुकूम कैसा ? एक विनती है। जब तक हम दुर्ग पर है तब तक किसी को भी ढलान से गिराने की सजा नहीं देंगे।’
‘जैसी आज्ञा।’ कहके विश्वासराव चले गए।
एक जीवनदान जिसने सब बदल दिया
हनुमंते ने कहा, ‘मासाहेब ! आप थे, इसलिए उस बेचारे की जान बची। यह श्रेय अपने विठू को जाता है।’
रानी जिजाबाई ने विठू की ओर देखा। विठू ने झिझकते हुए कहा, ‘ऐसा नहीं है, रानी सरकार ! अगर सच बात कहूं, तो उन्होंने कहा। दोपहर को उसे दुर्ग पर लाया गया, बेचारा रो रहा था। हनुमंते ने मुझसे कहा, कि अगर कोई यह बात रानी सरकार को बता दे, तो उसकी जान बच जाएगी।’
रानी जिजाबाई मुस्कुराये। उन्होंने कहा, ‘और इसीलिए आपने ऐसा कहा, है ना ?... देखो, लक्ष्मीबाई, हमारे लोग कैसे चालें चलते हैं, वह ?’
दोनों हंस पड़े। रानी जिजाबाई ने कहा, ‘आओ, हनुमंतेकाका, टहलने चलें।’
शांत शाम और आने वाला तूफान
तट से नीचे, जुन्नार दिखाई देता था। नदी का किनारा दिखाई देता था। वह क्षेत्र का अवलोकन कर चलते समय बीच में रानी जिजाबाई रुक गए। तट के नीचे उंगली दिखाते हुए उन्होंने लक्ष्मीबाई से कहा,
‘लक्ष्मीबाई, तुम्हें वह हरा बिंदु दिखाई दे रहा है, क्या यह जुन्नारमल की अमराई है ना ?’
‘जी।’
रानी जिजाबाई ने गहरी सांस छोड़ी। पीछे मुड़कर झील के पास आकर झील के किनारे बैठ गयी। इसके पीछे भवन की सजावट आसमान पर चढ़ती हुई प्रतीत हो रही थी। सूर्यास्त को नमस्कार करके सभी लोग भवन में लौट आये।
क्षमा का उदाहरण
भवन के द्वार पर एक इस्म तीर की तरह सामने आया। क्या हो रहा है, यह समझने से पहले ही वह रानी जिजाबाई के चरणों में गिर पड़ा। विठू दौड़ा। उन्होंने उस इसम को खड़ा किया। लंबे बाल, धंसी हुई आंखें। भयानक चेहरे का वह जंगली इस्म रो रहा था। कोई शब्द नहीं थे। विठू ने कहा,
‘यह वही इसम है, जिसे ढलान से गिराने की सज़ा मिली थी।’
रानी जिजाबाई ने कहा,‘फिर से चोरी मत करना बाबा ! भगवान के चरण पकड़ो।’
-और इतना कहकर वे अंदर चले गए। विश्वासराव भवन में खड़े थे। रानी जिजाबाई ने मुस्कुराते हुए कहा,
‘विश्वासराव, उस आदमी को छोड़ दिया, बहुत अच्छा किया। गरीब बेचारा। वह खुशी से भी रो रहा था।’
‘जी।’ विश्वासराव ने कहा।
अचानक आई खबर जिसने सब बदल दिया
विश्वासराव की गंभीर मुद्रा देखकर रानी जिजाबाई का दिल बैठ गया। उन्होंने पूछा,
‘क्या हुआ विश्वासराव ?’
‘रानी साहब ! खबर उतनी अच्छी नहीं है।’
‘मुझे बताओ। समय बर्बाद मत करो।’
‘महाराजाओं ने विजापुर के क्षेत्र पर कब्ज़ा करके विद्रोह कर दिया, इसलिए विजापुरकरने मुरार जगदेव को पुणे भेजा। मुरार जगदेवा ने पुणे शहर की होली की। भवन भस्मीभूत हो गये। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने पुणे में एक गधे को पूरे दिन जोतकर जोत दिया। उसने गांव का नामोनिशान भी नहीं छोड़ा। पुणे के कलेजे में, शहाजी महाराज की जहागिरी में रक्षक रख के वह मुक्त हो गया।’
दिल तोड़ देने वाली दूसरी खबर
‘और सवारी ?’रानी जिजाबाई ने धीमी आवाज में पुछा। उनका गला सूख गया था।
‘खबर आई है कि महाराज सुरक्षित हैं। वर्तमान में फलटन के पक्ष में महाराज हैं। ये खबर दो दिन पहले आई थी। महाराजाओं से समाचार की प्रतीक्षा कर रहा था।’
रानी जिजाबाई ने पसीना पोंछा। उन्होंने कहा,
‘विश्वासराव, भाग्य पलट गया, तुम उसका क्या करोगे ? यहां से सुरक्षित रहना ही बड़ी बात है। बुराई में अच्छाई, बस इतना ही !’
विश्वासराव मुजरा करने के बाद चले गए...और रानी जिजाबाई ने अपने रोके हुए आंसू को रास्ता दिया।
लक्ष्मीबाई उन्हें साहस देने का प्रयास कर रही थीं।
लगातार आघात
ख़बरें भी कभी अकेली नहीं आतीं। रानी जिजाबाई इस आघात को सहन करने में सफल नहीं हुईं, वही समाचार आया: शहाजी महाराज के चचेरे भाई खेलोजी भोसले की पत्नी अर्थात रानी जिजाबाई की सहभाभी जी को, महाबत खान ने उस समय अपहरण कर लिया जब वह गोदावरी में स्नान करने के लिए नासिक गई थीं। उस आंधी से रानी जिजाबाई का जीवन छिन्न-भिन्न हो गया। उस दिन के बाद उन्हें दुर्ग के नीचे उतरकर देवदर्शन करने का साहस भी न हुआ।
महल में छाया सन्नाटा
विश्वासराव, नारो त्रिमल, गोमाजी पानसंबल, हनुमंते आदि के आसपास की मंडली हमेशा चिंतित दिखती थी। गोमाजी पानसंबल रानी जिजाबाई के मायके के खास व्यक्ति। पिता की समर्थन के साथ रानी जिजाबाई को बताने वाले भी वही, लेकिन उनकी बातें भी रानी जिजाबाई को संतुष्ट नहीं कर सकीं। लक्ष्मीबाई हमेशा जीजाबाई के मनोरंजन के लिए नए-नए तरीके खोजती रहती थीं। यह सारी मंडली, जो रानी जिजाबाई की पीड़ा पर मन के धैर्य से फूंक मारने की कोशिश कर रही थी, एक दिन चुप हो गई। किसी न किसी कारण से, हमेशा मुस्कुराती रहने वाली लक्ष्मीबाई की नज़रें खोने लगीं। दासियों के कदम भारी हो गये। विश्वासराव, पानसंबल और हनुमंते, जो बिना किसी कारण के लंबे समय तक बात करते थे, संक्षिप्त उत्तर के बारे में शिकायत करने लगे। रानी जिजाबाई के ये सब ध्यान में आ रहे थे। लेकिन मतलब समझ नहीं आया।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- रानी जिजाबाई – छत्रपति शिवाजी महाराज की माता, न्यायप्रिय और दूरदर्शी नेता।
- विश्वासराव – दुर्ग के प्रशासनिक अधिकारी।
- हनुमंते – विश्वासी सेवक और सलाहकार।
- लक्ष्मीबाई – रानी की सखी और सहयोगी।
- विठू – सेवक जिसने एक व्यक्ति की जान बचाई।
- मुरार जगदेव – विजापुर का सेनापति जिसने पुणे नष्ट किया
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग दर्शाता है कि मराठा साम्राज्य की नींव न्याय, करुणा और धैर्य पर आधारित थी।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- न्याय के साथ करुणा जरूरी है
- कठिन समय में धैर्य रखना चाहिए
- नेतृत्व में संवेदनशीलता महत्वपूर्ण है
निष्कर्ष
रानी जिजाबाई का यह प्रसंग सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व शक्ति से नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता से होता है।

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