दुर्ग पर गर्भवती रानी जिजाबाई का जीवन और न्याय
दुर्ग पर गर्भवती रानी जिजाबाई का जीवन और न्याय का प्रसंग
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| दुर्ग पर गर्भवती रानी जिजाबाई का जीवन और न्याय |
दुर्ग पर सब कुछ शांत था… समय धीरे-धीरे बीत रहा था। रानी जिजाबाई का जीवन अनुशासन, भक्ति और सादगी से भरा हुआ था। लेकिन उस शांति के भीतर कुछ और भी पल रहा था—एक नई उम्मीद, एक नया भविष्य।
दिन वैसे ही शुरू हुआ जैसे हर दिन होता था… लेकिन शाम होते-होते सब बदल गया।
एक साधारण सैर के दौरान अचानक एक खबर ने माहौल को गंभीर बना दिया—टकमक पर किसी को सजा दी जाने वाली थी।
कौन था वह अपराधी? उसका अपराध क्या था?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या वह सजा उचित थी?
रानी जिजाबाई के मन में सवाल उठने लगे। उनका शांत चेहरा अब निर्णय के द्वार पर खड़ा था। एक ओर कठोर न्याय, दूसरी ओर करुणा…
अब जो होने वाला था, वह केवल एक व्यक्ति की किस्मत नहीं, बल्कि न्याय की परिभाषा तय करने वाला था।
आखिर रानी जिजाबाई क्या निर्णय लेंगी?
यही जानने के लिए आपको यह पूरी कहानी पढ़नी होगी…
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की रानी जिजाबाई को शाही पालकी में बैठाकर दुर्ग की ओर ले जाया जा रहा था। चारों ओर सैनिक, सरदार और गूंजती हुई खामोशी… जैसे हर कोई जानता हो कि यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि किसी बड़े भविष्य की शुरुआत है।
रास्ते में लखुजी जाधवराव की बेचैनी और उनकी रहस्यमयी बातें माहौल को और गहरा बना देती हैं। दुर्ग पर पहुँचते ही देवी के मंदिर में एक ऐसी मन्नत मांगी जाती है, जिसका रहस्य उस समय किसी को समझ नहीं आता…
लेकिन जब विदाई का समय आता है, तब लखुजी के शब्द—एक भविष्यवाणी बन जाते हैं:
‘ऐसा पुत्र जन्म लेगा… जो तुम्हारा ही नहीं, इतिहास का भी गौरव बनेगा…’
आखिर उस मन्नत में क्या छिपा था? क्यों उस दिन हर किसी की आंखों में अनजाना डर और उम्मीद साथ-साथ थी?
पूरी कहानी पढ़ें. . .और जानें उस पल के पीछे छिपा वह रहस्य, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे?
लेख का विस्तृत सारांश
४-१
दुर्ग पर रानी जिजाबाई का दैनिक जीवन
महीने बीत रहे थे।
रानी जिजाबाई सुबह उठतीं। स्नान, पूजा-अर्चना समाप्त करने में सूर्योदय होता। उसके बाद रसोई में लक्ष्मीबाई के साथ खाना पकाने में कुछ समय बितातीं। पोथी पढ़ने के बाद भोजन, कुछ विश्राम।
शाम को पैर मुक्त करने के लिए बाहर जातीं। हर एक-दो दिन में कभी-कभी शिवाई के दर्शन के लिए नीचे उतरतीं। भगवान के दर्शन के लिए पैदल ही जातीं। पालकी से जाने की विनती करने पर भी, रानी जिजाबाई ने कभी विश्वासराव की नहीं सुनीं।
दुर्ग पर आकर रानी जिजाबाई को चार महीने होने को आए।
भवन का शांत वातावरण और भावनात्मक संवाद
दोपहर में, रानी जिजाबाई भवन में सोई थीं। लक्ष्मीबाई नीचे जामखाने पर कुछ सिलाई कर रही थीं। सेविका, रानी जिजाबाई के पैर की मालिश कर रही थीं। ऐसे ही, लक्ष्मीबाई ने पूछा,
‘रानी साहब...’
‘लक्ष्मीबाई, मुझे अजनबी की तरह “रानी साहब” मत कहो। हम समकक्ष हैं। “जिजा” कहकर पुकारो !’
‘आत्मीयता आ गई, तो चरण कैसे छूटेगा ?’
‘तुम सुनोगी ही नहीं... क्या पूछना है ?’
‘बताओगे ?’
‘बताती हूं ना !’
‘क्या आपको कुछ खास खाने की इच्छा हो रही है ? मैं देख रही हूं, आप कुछ बताती नहीं।’
रानी जिजाबाई मुस्कुराईं। ‘सच कहूं, लक्ष्मीबाई ? मुझे खाने-पीने की कोई लालसा नहीं है... मन करता है, घोड़े पर सवार होकर दौड़ लगाऊं, कमर में तलवार बांधूं। दुर्ग की ठंडी हवा पिऊं। पर्वत पर खड़े होकर नीचे के मैदानों को आंखें भरकर देखूं। किस्मत से मेरी सारी मनोकामनाएं पूरी हुई हैं।’
लक्ष्मीबाई मुस्कुराईं। वे सिलाई का काम समेटने लगीं। रानी जिजाबाई ने पूछा,
‘उठे क्यों?’
‘आप आराम करें। थोड़ा सो जाएं। अच्छा लगेगा।’
मातृत्व का भाव और संवेदनशील क्षण
‘सच कहूं ?’ रानी जिजाबाई ने कहा, ‘मुझे अभी सोने का मन ही नहीं करता।’
‘वो क्यों ?’
रानी जिजाबाई शरमाईं। पेट पर हाथ रखते हुए, उन्होंने कहा,
‘क्योंकि, यह खेल रहा है ना ?’
लक्ष्मीबाई भावुक हो उठीं। उनसे रहा नहीं गया। गर्भवती रानी जिजाबाई के तेजस्वी चेहरे को सहलाते हुए, कान की बालियों पर उंगलियां मोड़ते हुए, वह बोलीं,
‘कहीं नजर ना लग जाए, तुम्हें। ऐसा कुछ मत कहो। थोड़ा सो जाओ।’ कहकर लक्ष्मीबाई उठकर चली गईं।
संध्या की सैर और अचानक खबर
संध्या के समय, रानी जिजाबाई, लक्ष्मीबाई दासीपरिवार के साथ टहलने के लिए बाहर पड़ीं, और द्वार पर सेवक विठू आया।
‘विठू, क्या बात है ?’ रानी जिजाबाई ने पूछा।
‘रानी साहब, क्या आप टकमक की ओर टहलने जा रही हैं ?’
‘हां !’
‘एक विनती है। कृपया मावलती की ओर जाएं !’
‘क्यों ?’
‘एक अपराधी को ढलान से गिराने की सजा के लिए पेश किया जा रहा है। उसकी सुनवाई अभी हो रही है।’
‘कौन है वह बेचारा ?’
‘रानी साहब, मुझे मालूम नहीं। टकमक के सभी मार्गों को रोका गया है, इसलिए प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाई।’
‘विठू, ऐसे ही जाओ और विश्वासराव से कहो कि उन्हें बुलाया है।’
‘जी...’ कहते हुए विठू चला गया।
न्याय की कठोरता और रानी जिजाबाई का प्रश्न
जब विश्वासराव पहुंचे, तो साथ में वरिष्ठ हनुमंते भी मौजूद थे। दोनों ने मिलकर रानी साहेबा को प्रणाम किया। रानी जिजाबाई ने कहा,
‘विश्वासराव ! आज किसको ढलान से गिराने की सजा दी जा रही है ?’
‘किसने कहा ?’
‘हमें पता चला ! पर क्या सच में ?’
‘हां, रानी साहब। कल पिछले मोहल्ले में, किसी ने अनाज के ढेर की चोरी की।’
रानी जिजाबाई ने आश्चर्य से पूछा —
‘उसके लिए ढलान से गिराने की सजा ?’
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- रानी जिजाबाई – छत्रपति शिवाजी महाराज की माता, दृढ़, धार्मिक और न्यायप्रिय व्यक्तित्व।
- लक्ष्मीबाई – रानी जिजाबाई की सहचरी, स्नेही और समर्पित सेविका।
- विश्वासराव – दुर्ग के अधिकारी, प्रशासनिक कार्यों के जिम्मेदार।
- विठू – सेवक, जो महत्वपूर्ण सूचना लेकर आता है।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग मराठा शासन की न्याय प्रणाली और उसकी कठोरता को दर्शाता है। साथ ही, यह रानी जिजाबाई के व्यक्तित्व को उजागर करता है — जहां एक ओर मातृत्व की कोमलता है, वहीं दूसरी ओर न्याय के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता भी है।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- न्याय करते समय संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
- शक्ति और करुणा का संतुलन ही सच्चा नेतृत्व है।
- मातृत्व के साथ-साथ कर्तव्य भी निभाना चाहिए।
निष्कर्ष
यह प्रसंग हमें दिखाता है कि रानी जिजाबाई केवल एक माता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी और न्यायप्रिय नेत्री भी थीं। उनके जीवन का हर क्षण प्रेरणा से भरा हुआ है।

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